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भारत में मुस्लिम आक्रमण का पूरा दौर

“भारत में मुसलिम आक्रमण



पैगंबर हजरत मोहम्मद

पैगंबर मोहम्मद का जन्म अरब के रेगिस्तान के शहर मक्का में 570 ईस्वी में हुआ था। पैगंबर साहब के जन्म से पहले ही उनके पिता का निधन हो चुका था। जब वह 6 वर्ष के थे तो उनकी मां की भी मृत्यु हो गई। मां के निधन के बाद पैगंबर मोहम्मद अपने चाचा अबूतालिब और दादा अबूमुतालिब के साथ रहने लगे। इनके पिता का नाम अब्दुल्लाह और माता का नाम बीबी अमीना था।

पैगंबर मोहम्मद मूर्ति पूजा या किसी भी चित्र की पूजा के खिलाफ थे। यही वजह है कि उनकी कहीं भी तस्वीर या मूर्ति नहीं मिलती है। इस्लाम में मूर्ति पूजन की मनाही है। पैगंबर मोहम्मद इस्लाम के आखिरी पैगंबर हैं। कुरान के मुताबिक, एक रात जब वह पर्वत की एक गुफा में ध्यान कर रहे थे तो फरिश्ते जिब्राइल आए और उन्हें कुरान की शिक्षा दी। अल्लाह का संदेश मानकर पैगंबर मोहम्मद जिंदगी भर इसे दोहराते रहे। उनके शब्दों को याद कर लिया गया और संग्रहित कर लिया गया। पैगंबर का विश्वास था कि अल्लाह ने उन्हें अपना संदेशवाहक चुना है इसलिए वह दूसरों को भी अल्लाह का संदेश देने लगे।

चूंकि ख़दीजा पहली शख्स थीं, जिन्हें मोहम्मद साहब ने अपनी अनुभूतियों के बारे में बताया था इसलिए इतिहास में उन्हें पहला मुसलमान माना जाए। एक नए धर्म में दीक्षित होने वाला पहला शख्स।

सन 622 ई. में मोहम्मद को अपने अनुयायियों के साथ मक्का से मदीना कूच करना पड़ा। उनके इस सफर को हिजरत कहा गया। इसी वर्ष इस्लामी कैलेंडर हिजरी की भी शुरुआत हुई। मदीना के लोग आपसी लड़ाइयों से परेशान थे और मोहम्मद साहब के संदेशों ने उन्हें वहां बहुत लोकप्रिय बना दिया। उस समय मदीना में तीन महत्वपूर्ण यहूदी कबीले थे। कुछ ही वर्षों में पैगंबर मोहम्मद के बड़ी संख्या में अनुयायी हो चुके थे और तब उन्होंने मक्का लौटकर विजय हासिल की। मक्का में स्थित काबा को इस्लाम का पवित्र स्थल घोषित कर दिया गया। सन 632 ई. में हजरत मुहम्मद साहब का देहांत हो गया पर उनकी मृत्यु तक लगभग पूरा अरब इस्लाम कबूल कर चुका था।

मक्का’ सऊदी अरब में स्थित है, यहीं पर 570 ई. में इस्लाम धर्म के प्रवर्तक हजरत मुहम्मद का जन्म हुआ था। इसी कारण यह स्थान मुस्लिम अनुयायियों का पवित्र तीर्थ स्थल है। इनकी मृत्यु 632 ई. में हुई थी।

हिंद (भारत) की जनता

ऋग्वेद में उल्लिखित ‘भरत’ कबीले के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा। परंपरानुसार दुष्यंत के पुत्र भरत के नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा है। कुछ विद्वानों के अनुसार ऋषभदेव के ज्येष्ठ पुत्र, भरत के नाम पर इस देश का नाम भारत पड़ा है। ईरानियों ने इस देश को ‘हिंदुस्तान’ कहकर संबोधित किया है तथा यूनियनों ने इसे ‘इंडिया’ कहा है। हिंद (भारत) की जनता के संदर्भ में ‘हिंदू’ शब्द का सर्वप्रथम प्रयोग अरबों द्वारा किया गया था।

भारत पर पहला मुस्लिम आक्रमण

भारत पर पहला मुस्लिम आक्रमण 712 ई. में अरब आक्रमणकारी मुहम्मद बिन कासिम के नेतृत्व में हुआ था। मुहम्मद-बिन-कासिम से पूर्व 711 ई. में ही उबैदूल्लाह के नेतृत्व में एक अभियान दल भेजा गया, परंतु वह पराजित हुआ और मारा गया। इराक के हाकिम अल-हज्जाज ने मुहम्मद-बिन-कासिम के नेतृत्व में अरबों को सिंध पर आक्रमण करने के लिए भेजा। भारी संघर्ष के बाद अरबों ने 712 ई. में सिंध पर विजय प्राप्त कर ली। उस समय सिंध पर दाहिर का शासन था।

चचनामा

फारसी ग्रंथ ‘चचनामा’ से अरबों द्वारा सिंध विजय की जानकारी मिलती है।

चचनामा ‘अली अहमद’ द्वारा अरबी भाषा में लिखित महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है। इस ग्रंथ में अरबों द्वारा सिंध विजय का वर्णन किया गया है। नासिरुद्दीन कुबाचा के समय इसका फ़ारसी अनुवाद अली बिन बफ कूफी ने किया था राजा दाहिर आठवीं सदी में सिंध के शासक थे। वो राजा चच के सबसे छोटे बेटे और ब्राह्मण वंश के आख़िरी शासक थे। 

इतिहासकारों के मुताबिक़ राजा दाहिर की हुकूमत पश्चिम में मकरान तक, दक्षिण में अरब सागर और गुजरात तक, पूर्व में मौजूदा मालवा के केंद्र और राजपूताने तक और उत्तर में मुल्तान से गुज़रकर दक्षिणी पंजाब तक फैली हुई थी। सिंध से ज़मीनी और समुद्री व्यापार भी होता था।

आठवीं सदी में बग़दाद के गवर्नर हुज्जाज बिन यूसुफ़ के आदेश पर उनके भतीजे और नौजवान सिपहसालार मोहम्मद बिन कासिम ने सिंध पर हमला करके राजा दाहिर को शिकस्त दी और यहां अपनी हुकूमत क़ायम की। सिंध में अरब इतिहास की पहली किताब ‘चचनामा’ या ‘फ़तेहनामा’ के अनुवादक अली कोफ़ी लिखते हैं कि श्रीलंका के राजा ने बग़दाद के गवर्नर हुज्जाज बिन यूसुफ़ के लिए कुछ तोहफ़े भेजे थे जो दीबल बंदरगाह के क़रीब लूट लिय गए। इन समुद्री जहाज़ों में औरतें भी मौजूद थीं। कुछ लोग फ़रार होकर हुज्जाज के पास पहुंच गए और उन्हें बताया कि औरतें आपको मदद के लिए पुकार रही हैं।

इतिहासकारों के मुताबिक़ हुज्जाज बिन यूसुफ़ ने राजा दाहिर को पत्र लिखा और आदेश जारी किया कि औरतें और लूटे गए माल और सामान वापस किया जाए हालांकि राजा दाहिर ने इनकार किया और कहा कि ये लूटमार उनके इलाक़े में नहीं हुई। ओमान में माविया बिन हारिस अलाफ़ी और उसके भाई मोहम्मद बिन हारिस अलाफ़ी ने ख़लीफ़ा के ख़िलाफ़ बग़ावत कर दी, जिसमें अमीर सईद मारा गया। ‘चचनामा’ के मुताबिक़ मोहम्मद अलाफ़ी ने अपने साथियों के साथ मकरान में पनाह हासिल कर ली जहां राजा दाहिर की हुकूमत थी।

बग़दाद के गवर्नर ने उन्हें कई पत्र लिखकर बाग़ियों को उनके सुपुर्द करने के लिए कहा लेकिन उन्होंने अपनी ज़मीन पर पनाह लेने वालों को हवाले करने से इनकार कर दिया। हमले की एक वजह ये भी समझी जाती है।

भारत पर सर्वप्रथम मुस्लिम आक्रमणकारी थे

भारत पर सर्वप्रथम अरबी मुसलमानों का आक्रमण 636 ई. में हुआ था। यह आक्रमण खलीफा उमर के समय में बंबई के निकट थाणे पर हुआ, परंतु यह आक्रमण असफल रहा। भारत पर पहला सफल आक्रमण 712 ई. में मुहम्मद बिन कासिम द्वारा किया गया। खलीफा अल वाजिद के शासनकाल में यह आक्रमण हुआ था। कासिम के आक्रमण के समय सिंध का शासक दाहिर था। इसने सिंध (712) तथा मुल्तान (713) को जीता।

मुहम्मद बिन कासिम

मुहम्मद बिन कासिम एक अरबी था। वह इराक के राजा अल-हज्जाज का भतीजा और दामाद दोनों था। जिस समय उसने सिंध पर आक्रमण किया। उसकी आयु मात्र 17 वर्ष थी। वह दस हजार घुड़सवारों की सेना के साथ आया था। यह आक्रमण जल और थल दोनों रास्तों से किया गया था। पहले उसने देबाल के बंदरगाह पर कब्जा कर लिया, जो आजकल की कराची के निकट है। उस समय देबाल का सुबेदार ज्ञानबुद्ध नामक सरदार था, जो कि बौद्ध था। कासिम ने उसे सिंध की गद्दी का लालच देकर अपनी ओर कर लिया। इससे देबाल में उपस्थित सेना निष्क्रिय हो गयी। लेकिन अरब सेना के देबाल पहुँचने का समाचार राजा दाहिर को मिल चुका था। उनका पुत्र जय शाह अपनी सेना के साथ तैयार होकर देबाल आ गया। लेकिन ज्ञानबुद्ध के विश्वासघात के कारण सिंध के सैनिक हार गये और देबाल पर अरबों का कब्जा हो गया देबाल के पतन का समाचार आलोर में राजा दाहिर को मिला, तो वे अपनी सेना लेकर युद्ध के लिए आ गये।

20 जून , सन् 712 ई. के दिन रावर नामक स्थान पर राजा दाहिर की सेना ने कासिम की सेना का मुकाबला किया। उन्होंने बहुत वीरता दिखाई, लेकिन आँख में तीर लग जाने के कारण वे हाथी से गिर गये और गिरते ही अरब सैनिकों ने तीरों और भालों से उनके शरीर को छलनी कर दिया। अपने राजा को मृत देखकर सिंधी सेना का मनोबल टूट गया और वे हार गये। सिंध पर कासिम का कब्जा हो गया। इसके फौरन बाद उसने अपना असली चरित्र दिखा दिया। जिन बौद्धों ने उसकी सहायता की थी, उनको ही उसने गाजर-मूली की तरह काट डाला। उसने तक्षशिला विश्वविद्यालय को पूरी तरह नष्ट कर दिया। किसी बात पर नाराज होकर नये खलीफा ने उसे वापस बुला लिया और जेल में डाल दिया, जहाँ यातनाओं से उसका प्राणान्त हो गया।

गजनी राजवंश

गजनी वंश का संस्थापक अल्पतगीन था। गजनी वंश का अन्य नाम यामिनी वंश भी है। अल्पतगीन ने गजनी को अपनी राजधानी बनाया। इस समय उत्तर-पश्चिम भारत में हिंदूशाही राजवंश का राज्य था, जिसका विस्तार हिंदुकूश पर्वतमाला तक था। 963 ई. में अल्पतगीन की मृत्यु के बाद उसका पुत्र इस्हाक उसका उत्तराधिकारी बना।

अल्पतगीन के उत्तराधिकारी :

इस्हाक – यह अल्पतगीन का पुत्र था अल्पतगीन की मृत्यु के बाद गद्दी पर बैठा यह केवल 3 वर्ष तक शासन कर पाया इसके पश्चात इसके सेनापति बलक्तगीन गजनी वंश का उत्तराधिकारी बना।

बलक्तगीन – यह इस्हाक का सेनापति था इस्हाक की मृत्यु के बाद यह गद्दी पर बैठा था। 972 ई. में इसकी मृत्यु हो गई।

पीराई अल्पतगीन का एक गुलाम था। बलक्तगीन की मृत्यु के बाद यह गजनी वंश की गद्दी पर बैठा। यह अत्याचारी और अयोग्य था इस के समय में हिंदू शाही वंश के राजा जयपाल ने पीराई के विरुद्ध अपने पुत्र के नेतृत्व में एक सेना भेजी लेकिन सुबुक्तगीन ने उस सेना पर अचानक आक्रमण कर उसे समाप्त कर दिया। 977 ई. में पीराई को हटाकर सुबुक्तगीन ने गद्दी पर अधिकार कर लिया। अपनी मृत्यु से पूर्व सुबुक्तगीन ने पूरा अफगानिस्तान, खुरासान, बल्ख और भारत के पश्चिम उत्तर सीमा को अपने साम्राज्य में सम्मिलित कर लिया था 997 ईस्वी में सुबुक्तगीन की मृत्यु हो गई।

महमूद गजनी

महमूद ग़ज़नवी यामिनी वंश का तुर्क सरदार ग़ज़नी के शासक सुबुक्तगीन का पुत्र था। उसका जन्म 971 ई. में हुआ, 27 वर्ष की आयु में 998 ई. में वह शासनाध्यक्ष बना था। महमूद बचपन से भारतवर्ष की अपार समृद्धि और धन-दौलत के विषय में सुनता रहा था। उसके पिता ने एक बार हिन्दू शाही राजा जयपाल के राज्य को लूट कर प्रचुर सम्पत्ति प्राप्त की थी, महमूद भारत की दौलत को लूटकर मालामाल होने के स्वप्न देखा करता था। उसने 17 बार भारत पर आक्रमण किया और यहाँ की अपार सम्पत्ति को वह लूट कर ग़ज़नी ले गया था। परंतु इन आक्रमणों का उद्देश्य भारत में स्थायी मुस्लिम शासन की स्थापना करना नहीं था, बल्कि मात्र लूटपाट करना था। आक्रमणों का यह सिलसिला 1001 ई. से आरंभ हुआ। उसके आक्रमण और लूटमार के काले कारनामों से तत्कालीन ऐतिहासिक ग्रंथों के पन्ने भरे हुए है।

चंदेल शासक विद्याधर

महमूद गजनवी का चंदेलो पर प्रथम आक्रमण 1019-20 ई. में हुआ। उस समय चंदेल वंश का शासक विद्याधर था, जो अपने वंश का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक था। मुस्लिम स्रोतों से पता चलता है कि विद्याधर एवं महमूद के बीच किसी नदी के किनारे भीषण युद्ध हुआ, किंतु इसका कोई परिणाम न निकला। इस युद्ध में विद्याधर ने राजनीतिक सूझ-बूझ का परिचय देते हुए युद्ध -स्थल उपयुक्त न होने के कारण रात्रि के अंधकार में अपनी सेना को हटा लिया।

महमूद गजनवी भी लौट गया। इस प्रकार विद्याधर अकेला ऐसा हिंदू शासक था, जिसने मुसलमानों का सफलतापूर्वक प्रतिरोध किया। मुस्लिम लेखकों ने उसे तत्कालीन भारत का सर्वाधिक शक्तिशाली शासक बताया है। विद्याधर ने कुछ हिंदू राजाओं का एक मित्र- संघ बनाया जिसका मुख्य उद्देश्य कन्नौज के शासक राज्यपाल को सजा देना था। उनकी दृष्टि में राज्यपाल ने मथुरा और वृंदावन जैसे तीर्थ स्थानों को लूटने वाले महमूद से बिना युद्ध किए हुए भाग कर एक बड़ा अपराध किया था। इन राजाओं ने राज्यपाल पर आक्रमण कर उसे मार दिया।

उत्बी

महमूद गजनवी का दरबारी इतिहासकार था। महमूद गजनवी शिक्षित एवं सुसभ्य था। वह विद्वानों एवं कलाकारों का सम्मान करता था। उसने अपने समय के महान विद्वानों को गजनी में एकत्रित किया था। उसका दरबारी इतिहासकार उत्बी था। उसने ‘किताब-उल-यामिनी’ अथवा ‘तारीख-ए-यामिनी’ नामक ग्रंथ की रचना की।

फिरदौसी

फिरदौसी महमूद गजनवी का दरबारी कवि था। फ़ारसी भाषा के महाग्रंथ शाहनामा का लेखक, फिरदौसी है और यह महमूद गजनवी के दरबार का प्रसिद्ध विद्वान कवि था। इसे पूर्व के होमर की उपाधि दी जाती है। जबकि फरिश्ता ने ‘तारीख-ए-फरिश्ता’ या ‘गुलशन-ए-इब्राहिमी’ नामक किताब लिखी है।
फ़िरदौसी का पूरा नाम ‘हकीम अबुल क़ासिम फ़िरदौसी तुसी’ था। ये ईरान के तूस में ही पैदा हुए थे। 

उनका महाकाव्य ‘शाहनामा’ है जिसे लिखने में उन्होंने पूरी उम्र लगा दी थी। ‘शाहनामा’ खुरासान के शहजादे समानीद के लिए लिखा गया था। यह वह ज़माना था जब सातवीं शताब्दी में अरबों की ईरान पर विजय के बाद फ़ारसी भाषा और संस्कृति पर अरब प्रभुत्व दिखाई पड़ने लगा था। फ़िरदौसी के जीवनकाल में ही उनके संरक्षक शहजादे समानीद को सुल्तान महमूद ग़ज़नवी ने हरा दिया था और खुरासान का शासक बन गया था। महमूद ग़ज़नवी और फ़िरदौसी को लेकर कुछ रोचक कहानियां हैं जिन्हें काल्पनिक भी कहा जा सकता है।

कहा जाता है कि महमूद ग़ज़नवी ने फ़िरदौसी को यह वचन दिया था कि वह ‘शाहनामा’ के हर शेर के लिए एक दीनार देगा। वर्षों की मेहनत के बाद जब ‘शाहनामा’ तैयार हो गया और फ़िरदौसी उसे लेकर महमूद ग़ज़नवी के दरबार में गया तो सम्राट ने उसे प्रत्येक शेर के लिए एक दीनार नहीं बल्कि एक दिरहम का भुगतान करा दिया। कहा जाता है इस पर नाराज़ होकर फ़िरदौसी लौट गया और उसने एक दिरहम भी नहीं लिया। यह वायदा ख़िलाफ़ी कुछ ऐसी थी जैसे किसी कवि के प्रति शेर एक रुपये देने का वचन देकर प्रति शब्द एक पैसा दिया जाये। फ़िरदौसी ने गुस्से में आकर महमूद ग़ज़नवी के ख़िलाफ़ कुछ पंक्तियां लिखी। वे पंक्तियां इतनी प्रभावशाली थी कि पूरे साम्राज्य में फैल गयीं।

कुछ साल बाद महमूद ग़ज़नवी से उसके विश्वासपात्र मंत्रियों ने निवेदन किया कि फ़िरदौसी को उसी दर पर भुगतान कर दिया जाये जो तय की गयी थी। सम्राट के कारण पूछने पर प्रधानमंत्री ने कहा कि हम लोग साम्राज्य के जिस कोने में जाते हैं हमें वे पंक्तियां सुनने को मिलती हैं जो फ़िरदौसी ने आपके विरुद्ध लिखी हैं और हमारा सिर शर्म से झुक जाता है। उसे निर्धारित दर पर पैसा दे दिया जायेगा तो हमें बड़ा नैतिक बल मिलेगा।‘

सम्राट ने आदेश दे दिया। दीनारों से भरी गाड़ी जब फ़िरदौसी के घर पहुंची तो घर के अंदर से फ़िरदौसी का जनाज़ा निकल रहा था। पूरी उम्र ग़रीबी, तंगी और मुफ़िलसी में काटने के बाद फ़िरदौसी मर चुका था। कहते हैं कि फ़िरदौसी की एकमात्र संतान उसकी लड़की ने भी यह धन लेने से इंकार कर दिया था। इस तरह सम्राट कवि का कर्ज़दार रहा और आज भी है। शायद यही वजह है कि आज फ़िरदौसी का शाहनामा जितना प्रसिद्ध है उतनी ही या उससे ज्यादा प्रसिद्ध वे पंक्तियां है जो फ़िरदौसी ने महमूद ग़ज़नवी की आलोचना करते हुए लिखी थीं।

फिरदौसी की इस कविता का एक अंश है –

वो बेशर्म सुल्तान जो तुम्हारी तरह गरीबों को पीसता है,
उसे हमेशा के लिए बदनाम होना पड़ेगा,
फिरदौसी के दर्द में डूबे उन शब्दों को रट लो
जो उसने शाहनामा में लिखे। जिस-जिसने इन्हें पढ़ा है।
जो कोई भी इसे पढ़कर और अकलमंद हुआ है...
...जान ले कि फिरदौसी ने तीस सालों तक
शाही वादे की कद्र की, उसका ख्याल रखा।
उसे बदले में बुढ़ापे में बस धोखा मिला
                    फिरदौसी ने शाहनामा के आखिर में लिखा है –
मैं इस महान इतिहास के अंत में पहुंच गया हूं,
और सारी ज़मीं मुझसे बात करेगी।
मैं मरूंगा नहीं, मैंने जो शब्दों के बीज बोए हैं वो
मेरा नाम और मेरी इज़्ज़त को कब्र में भी बनाए रखेंगे।
और मेरे जाने के बाद सारे समझदार लोग मेरी शोहरत को बनाए रखेंगे।

होमर यूनान के ऐसे प्राचीनतम कवियों में से हैं जिनकी रचनाएँ आज भी उपलब्ध हैं और जो बहुमत से यूरोप के सबसे महान कवि स्वीकार किए जाते हैं। वे अपने समय की सभ्यता तथा संस्कृति की अभिव्यक्ति का प्रबल माध्यम माने जाते हैं। अन्धे होने के बावजूद उन्होंने दो महाकाव्यों की रचना की – इलीयड और ओडिसी।

अलबरूनी


पुराणों का अध्ययन करने वाला प्रथम मुसलमान अलबरूनी था। उसका जन्म 973 ई. में हुआ था। वह खीवा (उज़्बेकिस्तान) (प्राचीन खारिज्म) देश का रहने वाला था। वह महमूद गजनवी के साथ भारत आया था। उसने अपने वर्णन में भारत की परंपराओं, रीति रिवाजों और संस्कृति पर बड़े पैमाने पर अपना ध्यान आकर्षित किया है। उसने लिखा कि “हर वह वस्तु जो अपवित्र हो जाती है अपनी पवित्रता की मूल स्थिति को पुन: प्राप्त करने का प्रयास करती है और सफल होती है। सूर्य हवा को स्वच्छ करता है और समुद्र में नमक पानी को, यदि यह नहीं होता तो पृथ्वी पर जीवन असंभव होता।” 

अलबरूनी मात्र इतिहासकार ही नहीं था, उसके ज्ञान और रुचियों की व्याप्ति जीवन के अन्य क्षेत्रों तक थी, जैसे- खगोल-विज्ञान, भूगोल, तर्कशास्त्र, ओषधि-विज्ञान, गणित तथा धर्म और धर्मशास्त्र।

इन्हीं रुचियों ने उसे भारत की तत्कालीन धार्मिक-सांस्कृतिक स्थिति के बारे में ज्ञान प्राप्त करने के लिए प्रेरित किया। उसने संस्कृत का अध्ययन किया और अनेक संस्कृत रचनाओं का उपयोग किया जिसमें ब्रह्मगुप्त, बलभद्र तथा वाराहिमहिर की रचनाएं विशेष रूप से उल्लेखनीय हैं। उसने जगह-जगह भगवद्गीता, विष्णुपुराण तथा वायुपुराण को उद्धृत किया है। अलबरूनी ने अरबी भाषा में ‘तहकीक-ए-हिन्द’ की रचना की थी। सर्वप्रथम एडवर्ड साची ने अरबी भाषा से इस ग्रंथ का अनुवाद अंग्रेजी भाषा में किया। इसका अनुवाद हिन्दी में ‘रजनीकांत शर्मा द्वारा किया गया।

अलबरूनी अथवा अल-बेरूनी एक फ़ारसी विद्वान लेखक, वैज्ञानिक, धर्मज्ञ तथा विचारक था। वह ख्वारिज़्म को महमूद ग़ज़नवी द्वारा जीत लिया गया। सुल्तान महमूद ग़ज़नवी के सामने अलबेरूनी को एक क़ैदी के रूप में ग़ज़नी लाया गया था। उसकी विद्वत्ता से प्रभावित होकर महमूद ग़ज़नवी ने उसे अपने राज्य का ‘राज ज्योतिष’ नियुक्त कर दिया। अलबेरूनी ने ‘किताब-उल-हिन्द’ नामक पुस्तक की भी रचना की थी। अलबरूनी अरबी, फ़ारसी, तुर्की, संस्कृत, गणित, खगोल का प्रमुख जानकर था।

अलबरूनी द्वारा रचित कुल 14 पुस्तकों में ‘किताब उल हिन्द’ सबसे अधिक लोकप्रिय पुस्तक थी। उसकी इस पुस्तक को दक्षिण एशिया के इतिहास का प्रमुख स्रोत माना जाता है।
सुल्तान महमूद ग़ज़नवी की सेना के साथ अलबेरूनी भारत आया और कई वर्षों तक पंजाब में रहा। उसका असली नाम ‘अबू रैहान मुहम्मद’ था, लेकिन वह अलबेरूनी के नाम से ही अधिक प्रसिद्ध है, जिसका अर्थ होता है, “उस्ताद”।

वह बड़ा विद्वान था। भारत में रहकर उसने संस्कृत को बड़े ही प्रेमपूर्वक विषय के रूप में पढ़ा तथा हिन्दू दर्शन तथा दूसरे शास्त्रों का भी गहराई से अध्ययन किया। इसी अध्ययन के आधार पर उसने “तहकीक-ए-हिन्द” (भारत की खोज) नामक पुस्तक की रचना की थी। इस पुस्तक में हिन्दुओं के इतिहास, चरित्र, आचार-व्यवहार, परम्पराओं और वैज्ञानिक ज्ञान का विशद वर्णन किया गया है। इसमें मुसलमानों के आक्रमण के पहले के भारतीय इतिहास और संस्कृति का प्रामाणिक और अमूल्य विवरण मिलता है।

अलबरूनी एक धर्मनिरपेक्ष लेखक नहीं था।

अलबरूनी ने रत के बारे में जो वर्णन लिखा है 
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सामाजिक स्थिति :

अलबरूनी लिखता है कि सारा हिन्दू समाज जाति प्रथा के कड़े बन्धनों में जकड़ा हुआ था। उस समय बाल-विवाह और सती प्रथा की कुप्रथायें मौजूद थीं। विधवाओं को पुनः विवाह करने की आज्ञा नहीं थी।

धार्मिक अवस्था :

उसके वर्णन के अनुसार सारे देश में मूर्तिपूजा प्रचलित थी। लोग मन्दिरों को बहुत दान देते थे। मन्दिरों में बहुत-सा धन जमा था। साधारण जनता अनेक देवी-देवताओं में विश्वास रखती थी जबकि सुशिक्षित एवं विद्वान केवल एक ईश्वर में विश्वास रखते थे।

राजनीतिक जीवन :

सारा भारत छोटे-छोटे राज्य में बंटा हुआ था। उनमें से कन्नौज, मालवा, गुजरात, सिन्ध, काश्मीर तथा बंगाल अधिक प्रसिद्ध थे। इनमें राष्ट्रीय भावना की कमी थी। ये आपस में ईर्ष्या के कारण सदैव लड़ते रहते थे।

न्याय व्यवस्था :

फौजदारी कानून नरम थे। ब्राह्मणों को मृत्यु दण्ड नहीं दिया जाता था। केवल बार-बार अपराध करने वाले के ही हाथ-पैर काट दिए जाते थे।

भारतीय दर्शन :

भारतीय दर्शन से अलबरूनी बहुत प्रभावित हुआ। उसने भगवद्गीता और उपनिषदों के ऊंचे दार्शनिक विचारों की मुक्त कण्ठ से सराहना की है।

ऐतिहासिक ज्ञान :

इतिहास लिखने के बारे में वह लिखता है कि, “भारतीयों को ऐतिहासिक घटनाओं को तिथि अनुसार लिखने के बारे में बहुत कम ज्ञान है और जब उनको सूचना के लिए अधिक दबाया जाए तो वे कथा-कहानी शुरू कर देते हैं।”

स्वभाव :

भारतीय झूठा अभिमान करते हैं तथा अपना ज्ञान दूसरों को देने को तैयार नहीं होते हैं। उसने लिखा है कि, “हिन्दू अपना ज्ञान दूसरों को देने में बड़ी कंजूसी करते हैं, वे अपनी जाति के लोगों को बड़ी कठिनता से ज्ञान देते हैं, विदेशियों की बात तो दूर रही। हिन्दू यह समझते हैं कि उनका जैसा देश नहीं है, उनके जैसा संसार में कोई धर्म नहीं है, उनके जैसा किसी के पास ज्ञान नहीं है।

सोमनाथ मंदिर

गुजरात प्रांत के काठियावाड़ क्षेत्र में समुद्र के किनारे सोमनाथ नामक विश्वप्रसिद्ध मंदिर में 12 ज्योतिर्लिंगो में से एक स्थापित है।

इस सोमनाथ-ज्योतिर्लिंग की महिमा महाभारत, श्रीमद्भागवत तथा स्कंद पुराण आदि में विस्तार से बताई गई है। चन्द्रदेव का एक नाम सोम भी है। उन्होंने भगवान शव को ही अपना नाथ-स्वामी मानकर यहां तपस्या की थी इसीलिए इसका नाम ‘सोमनाथ’ हो गया।

कहते हैं कि सोमनाथ के मंदिर में शिवलिंग हवा में स्थित था। यह एक कौतूहल का विषय था। जानकारों के अनुसार यह वास्तुकला का एक नायाब नमूना था। इसका शिवलिंग चुम्बक की शक्ति से हवा में ही स्थित था। कहते हैं कि महमूद गजनबी इसे देखकर हतप्रभ रह गया था।

महमूद गजनवी के सोमनाथ मंदिर पर आक्रमण (1026 ई.) के समय यहां का शासक भीमदेव प्रथम (1022-63 ई.) था। महमूद मंदिर से अतुल संपत्ति लूटकर वापस लौट गया। महमूद के जाने के बाद भीमदेव प्रथम और मालवा के राजा भोज ने सोमनाथ मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया था।

संस्कृत मुद्रालेख के साथ चांदी के सिक्के

संस्कृत मुद्रालेख के साथ चांदी के सिक्के महमूद गजनवी ने जारी किए थे। महमूद गजनवी द्वारा जारी चांदी के सिक्कों के दोनों तरफ दो अलग-अलग भाषाओं में मुद्रालेख अंकित थे। ऊपरी भाग पर अंकित मुद्रालेख अरबी भाषा में था तथा दूसरी तरफ अंकित लेख संस्कृत भाषा (देवनागरी लिपि) में था।
सिक्के के मध्य भाग में संस्कृत भाषा में लिखा था-

“अवयक्तमेकम मुहम्मद अवतार निरूपित महमूद।“

इस लेख के चारों तरफ अंकित लेख था-

अवयक्तिया नाम अयाम टनकम हतो महमूदपुर संवतो 418”

चांदी के इस सिक्के (दिरहम) का वजन 3.0 ग्राम था।

शहाबउद्दीन मुहम्मद ग़ोर

शहाबउद्दीन मुहम्मद ग़ोरी 12वीं शताब्दी का अफ़ग़ान योद्धा था, जो ग़ज़नी साम्राज्य के अधीन ग़ोर नामक राज्य का शासक था। मुहम्मद ग़ौरी 1173 ई. में ग़ोर का शासक बना था। जिस समय मथुरा मंडल के उत्तर-पश्चिम में पृथ्वीराज और दक्षिण-पूर्व में जयचंद्र जैसे महान नरेशों के शक्तिशाली राज्य थे, उस समय भारत के पश्चिम उत्तर के सीमांत पर शहाब-उद-दीन मुहम्मद ग़ोरी (1173-1206 ई.) नामक एक मुसलमान सरदार ने महमूद ग़ज़नवी के वंशजों से राज्याधिकार छीन कर एक नये इस्लामी राज्य की स्थापना की।

मध्य एशिया के शासक शिहाबुद्दीन मुहम्मद गोरी ने 1192 ई. में उत्तर भारत को जीता। शिहाबुद्दीन मुहम्मद गोरी का प्रथम आक्रमण 1175 ई. में मुल्तान पर हुआ और 1205ई. तक वह साम्राज्य-विस्तार अथवा पूर्वविजित राज्य की रक्षा के लिए भारत पर चढ़ाई करता रहा। उसने 1175-76 ई. में मुल्तान और उच्छ पर आक्रमण किया, 1178 ई. में गुजरात पर आक्रमण किया और 1191 ई. में पृथ्वीराज चौहान के साथ तराइन की लड़ाई लड़ी।

इस युद्ध में मुहम्मद गोरी की पराजय हुई। तथापि तराइन के दूसरे युद्ध (1192 ई.) में पृथ्वीराज की हार हुई और उसके साथ ही एक केंद्रीय मुस्लिम राजनीतिक व्यवस्था स्थापित हुई, जो बाद तक कायम रही।

शहाबउद्दीन मुहम्मद ग़ोरी 12वीं शताब्दी का अफ़ग़ान योद्धा था, जो ग़ज़नी साम्राज्य के अधीन ग़ोर नामक राज्य का शासक था। मुहम्मद ग़ौरी 1173 ई. में ग़ोर का शासक बना था। जिस समय मथुरा मंडल के उत्तर-पश्चिम में पृथ्वीराज और दक्षिण-पूर्व में जयचंद्र जैसे महान नरेशों के शक्तिशाली राज्य थे, उस समय भारत के पश्चिम उत्तर के सीमांत पर शहाब-उद-दीन मुहम्मद ग़ोरी (1173-1206 ई.) नामक एक मुसलमान सरदार ने महमूद  ग़ज़नवी के वंशजों से राज्याधिकार छीन कर एक नये इस्लामी राज्य की स्थापना की। मुहम्मद ग़ोरी बड़ा महत्वाकांक्षी और साहसी था। वह महमूद ग़ज़नवी की भाँति भारत पर आक्रमण करने का इच्छुक था, किंतु उसका उद्देश्य ग़ज़नवी से अलग था। वह लूटमार के साथ ही साथ इस देश में मुस्लिम राज्य भी स्थापित करना चाहता था। उस काल में पश्चिमी पंजाब तक और दूसरी ओर मुल्तान एवं सिंध तक मुसलमानों का अधिकार था, जिसके अधिकांश भाग पर महमूद के वंशज ग़ज़नवी सरदार शासन करते थे। मुहम्मद ग़ोरी को भारत के आंतरिक भाग तक पहुँचने के लिए पहले उन मुसलमान शासकों से और फिर वहाँ के वीर राजपूतों से युद्ध करना था, अतः वह पूरी तैयारी के साथ भारत पर आक्रमण करने का आयोजन करने लगा। 

मुहम्मद ग़ोरी के जन्म की सही तिथि ज्ञात नहीं है, लेकिन कुछ इतिहासकार उसका जन्म 1149 ई. में मानते हैं। ग़ोरी राजवंश की नींव अलाउद्दीन जहानसोज़ ने रखी और 1161 ई. में उसके देहांत के बाद उसका पुत्र सैफ़उद्दीन ग़ोरी सिंहासन पर बैठा। अपने मरने से पहले अलाउद्दीन जहानसोज़ ने अपने दो भतीजों- शहाबउद्दीन, जो आमतौर पर मुहम्मद ग़ोरी कहलाता है और ग़ियासउद्दीन को क़ैद कर रखा था; लेकिन सैफ़उद्दीन ने उन्हें रिहा कर दिया।

उस समय ग़ोरी वंश ग़ज़नवियों और सलजूक़ों की अधीनता से निकलने के प्रयास में था।

उन्होंने ग़ज़नवियों को तो 1148-1149 में ही ख़त्म कर दिया था, लेकिन सलजूक़ों का तब भी ज़ोर था और उन्होंने कुछ काल के लिए ग़ोर प्रान्त पर सीधा क़ब्ज़ा कर लिया था; हालांकि उसके बाद उसे ग़ोरियों को वापस कर दिया था।
सलजूक़ों ने जब इस क्षेत्र पर नियंत्रण किया, तब उन्होंने सैफ़उद्दीन की पत्नी के ज़ेवर भी ले लिए थे। गद्दी ग्रहण करने के बाद एक दिन सैफ़उद्दीन ने किसी स्थानीय सरदार को यह ज़ेवर पहने देख लिया और तैश में आकर उसे मार डाला।
जब मृतक के भाई को कुछ महीनों बाद मौक़ा मिला तो उसने सैफ़उद्दीन को बदले में भाला मारकर मार डाला। इस तरह सैफ़उद्दीन का शासनकाल केवल एक वर्ष के आसपास ही रहा।

ग़ियासउद्दीन नया शासक बना और उसके छोटे भाई शहाबउद्दीन ने उसका राज्य विस्तार करने में उसकी बहुत वफ़ादारी से मदद की। शहाबउद्दीन उर्फ़ मुहम्मद ग़ोरी ने पहले ग़ज़ना पर क़ब्ज़ा किया और फिर 1175 में मुल्तान और ऊच्च पर और फिर 1186 में लाहौर पर। जब उसका भाई 1202 में मरा तो शहाबउद्दीन मुहम्मद ग़ोरी सुल्तान बन गया।

मुहम्मद गोरी को सबसे पहले किसने पराजित किया

1178 ई. में मुहम्मद गोरी ने गुजरात पर आक्रमण किया, किंतु मूलराज या भीम II ने अपनी योग्य एवं साहसी विधवा मां नायकी देवी के नेतृत्व में आबू पर्वत के निकट गोरी का मुकाबला किया और उसे परास्त कर दिया। यह गोरी की भारत में पहली पराजय थी।

शहाब-उद-दीन मुहम्मद ग़ोरी 12वीं शताब्दी का अफ़ग़ान सेनापति था जो 1202 ई. में ग़ोरी साम्राज्य का शासक बना। सेनापति की क्षमता में उसने अपने भाई ग़ियास-उद-दीन ग़ोरी (जो उस समय सुल्तान था) के लिए भारतीय उपमहाद्वीप पर ग़ोरी साम्राज्य का बहुत विस्तार किया और उसका पहला आक्रमण मुल्तान (1175 ई.) पर था। पाटन(गुजरात) के शासक भीम द्वितीय पर मोहम्मद ग़ौरी ने 1178 ई. में आक्रमण किया  किन्तु मोहम्मद ग़ौरी बुरी तरह पराजित हुआ। मोहम्मद ग़ोरी और पृथ्वीराज चौहान के बीच तराईन के मैदान में दो युद्ध हुए। 1191 ई. में हुए तराईन के प्रथम युद्ध में पृथ्वीराज चौहान की विजय हुई किन्तु अगले ही वर्ष 1192 ई. में पृथ्वीराज चौहान को तराईन के द्वितीय युद्ध में मोहम्मद ग़ोरी ने बुरी तरह पराजित किया। 
मोहम्मद ग़ोरी ने चंदावर के युद्ध (1194 ई.) में दिल्ली के गहड़वाल वंश के शासक जयचंद को पराजित किया। मोहम्मद ग़ौरी ने भारत में विजित साम्राज्य का अपने सेनापतियों को सौंप दिया और वह गज़नी चला गया। बाद में गोरी के गुलाम कुतुबुद्दीन ऐबक ने गुलाम राजवंश की नींव डाली।

सोलंकी वंश

मूलराज प्रथम

सोलंकी वंश अथवा गुजरात के चालुक्य शाखा की स्थापना मूलराज प्रथम (941-995 ई०) ने की थी। इसकी राजधानी अन्हिलवाड़ थी। मूलराज प्रथम शैव धर्म का अनुयायी था। मूलराज प्रथम का पुत्र चामुण्डराज था। चामुण्डराज के दो पुत्र थे- बल्लभराज तथा दुर्लभराज।

भीम प्रथम :

दुर्लभराज का उत्तराधिकारी उसका भतीजा भीमदेव प्रथम हुआ।

भीम प्रथम के शासनकाल में महमूद गज़नी ने सोमनाथ के मंदिर पर आक्रमण किया। महमूद गज़नी के सोमनाथ मंदिर ध्वस्त करके चले जाने के बाद भीमदेव प्रथम ने मंदिर का फिर से निर्माण करवाया।

भीम प्रथम ने कलचुरी नरेश कर्ण के साथ मिलकर धारा के परमार वंशी भोज के विरुद्ध एक संघ तैयार किया, जिसने भोज को पराजित किया।

भीम प्रथम के सामन्त बिमल ने आबूपर्वत पर दिलवाड़ा का प्रसिद्ध जैन मंदिर बनवाया।
इनके प्रबल प्रतिद्वन्दी परमार भोज तथा कलचुरी नरेश कर्ण थे।

मोढ़ेरा का सूर्य मंदिर (modhera sun temple) का निर्माण भीम प्रथम के द्वारा करवाया गया था।

कर्ण प्रथम :

भीम का पुत्र कर्ण एक निर्बल शासक था। कर्णावती नामक नगर बसाकर वहाँ उसने कर्णेश्वर का मन्दिर तथा कर्णसागर नामक झील का निर्माण करवाया था।

कर्ण प्रथम ने अन्हिलवाड़ के कर्णमेरु नामक मंदिर को बनवाया।

जयसिंह सिद्धराज

कर्ण के बाद उसकी पत्नी मयणल्लदेवी से उत्पन्न पुत्र जयसिंह सिद्धराज इस वंश का राजा बना।
सोलंकी वंश का प्रथम शक्तिशाली शासक जयसिंह सिद्धराज था।

प्रसिद्ध जैन विद्वान हेमचंद्र जयसिंह सिद्धराज के दरबार में था।

हेमचन्द्र अथवा हेमचन्द्रसूरि (1078 – 1162) श्वेताम्बर परम्परा के एक महान् जैन दार्शनिक और आचार्य थे।
हेमचन्द्र दर्शन, धर्म एवं अध्यात्म के महान् चिन्तक होने के साथ-साथ एक महान् वैयाकरण, आलंकारिक, महाकवि, इतिहासकार, पुराणकार, कोशकार, छन्दोनुशासक एवं धर्मोपदेशक के रूप में प्रसिद्ध हैं।

ये न्याय, व्याकरण, साहित्य, सिद्धान्त, संस्कृत, प्राकृत, अपभ्रंश और योग इन सभी विषयों के प्रखर विद्वान थे।
हेमचन्द्र राजा सिद्धराज जयसिंह के सभा-कवि थे।
वे बहुमुखी प्रतिभा सम्पन्न आचार्य थे।

आचार्य श्री जैन योग के महान्ज्ञाता एवं मंत्रशास्त्र के अधिकारी विद्वान थे।

इनके अद्वितीय ज्ञान एवं बहुमुखी प्रतिभा के कारण ही इन्हें ‘कलिकालसर्वज्ञ’ की उपाधि से अलंकृत किया गया है।
माउण्ट आबू पर्वत (राजस्थान) पर एक मंडप बनाकर जयसिंह सिद्धराज ने अपने सातों पूर्वजों की गजारोहि मूर्तियों की स्थापना की।

सिद्धपुर में रुद्रमहाकाल के मंदिर का निर्माण जयसिंह सिद्धराज ने किया था।
पाटन में सहस्रिलंग नामक कृत्रिम झील का निर्माण जयसिंह ने किया।

जयसिंह सिद्धराज ने परमार शासक यशोवर्मन को युद्ध में पराजित कर उसे बन्दी बना लिया था।

कुमारपाल :

जयसिंह का अपना कोई पुत्र नहीं था। इसलिए उसकी मृत्यु के बाद कुमारपाल राजा बना।

कुमार पाल ने मालवा नरेश बल्लार, चौहान शासक अर्णोराज एवं परमार शासक विक्रम सिंह को पराजित किया।
सोलंकी शासक कुमारपाल जैन-मतानुयायी था।
कुमारपाल जैन धर्म के अंतिम राजकीय प्रवर्तक के रूप में प्रसिद्ध है।

कुमारपाल के बाद उसका भतीजा अजयपाल राजा बना। अजयपाल के बाद उसका पुत्र मूलराज द्वितीय राजा बना।

भीम द्वितीय :

मूलराज द्वितीय के बाद उसका छोटा भाई भीम द्वितीय राजा बना।

1178 ई॰ में मुइजुद्दीन गोरी के नेतृत्व में तुर्कों ने भीम द्वितीय के राज्य पर आक्रमण किया किन्तु काशह्द के मैदान में भीम ने उन्हें बुरी तरह पराजित कर दिया।
1195 ई॰ में इन्होंने कुतुबुद्दीन को हराकर उसे अजमेर तक खदेड़ दिया।

सोलंकी वंश का अंतिम शासक भीम द्वितीय था।

भीम द्वितीय का एक सामन्त (मंत्री) लवण प्रसाद ने गुजरात में बघेल वंश (baghel Vansh) की स्थापना की थी।
बघेल वंश का कर्ण द्वितीय गुजरात का अंतिम हिन्दू शासक था, इसने अलाउद्दीन ख़िलजी की सेनाओं का मुकाबला किया था।

बघेलवंश ने गुजरात में तेरहवीं शताब्दी के अन्त तक शासन किया। इसके बाद गुजरात का स्वतन्त्र हिन्दू राज्य दिल्ली सल्तनत में मिला लिया गया।

भारत में मुहम्मद गोरी ने प्रथम इक्ता प्रदान किया था

गोरी की विजयों के बाद शीघ्र ही उत्तर भारत में इक्ता प्रथा (सैनिकों/ राज्य अधिकारियों को वेतन के बदले भूमि) स्थापित हो गई। 1192-1206 ई. तक कुतुबुद्दीन ऐबक ने गोरी के प्रतिनिधि के रूप में उत्तरी भारत के विजित भागों का प्रशासन संभाला। इस अवधि में ऐबक ने उत्तरी भारत में तुर्की शक्ति का विस्तार भी किया।

सोहावा झेलम, पाकिस्तान में मोहम्मद ग़ौरी का मकबरा स्थित है।

मृत्यु और देहान्तोपरांत :

15 मार्च 1206 में आधुनिक पाकिस्तान के झेलम क्षेत्र में नदी के किनारे मुहम्मद ग़ोरी को खोखर नामक जाट उपसमूह के लोगों ने अपने राज्य भेरा के ऊपर हुए हमलों का बदला लेने के लिए हमला किया जिसमें वह बच गया परन्तु कुछ समय पश्चात उसकी मृत्यु हो गयी, मुहम्मद ग़ोरी का कोई बेटा नहीं था और उसकी मौत के बाद उसके साम्राज्य के भारतीय क्षेत्र पर उसके प्रिय ग़ुलाम क़ुतुब-उद-दीन ऐबक ने दिल्ली सल्तनत स्थापित करके उसका विस्तार करना शुरू कर दिया।

उसके अफगानिस्तान व अन्य इलाक़ों पर ग़ोरियों का नियंत्रण न बच सका और ख़्वारेज़्मी साम्राज्य ने उन पर क़ब्ज़ा कर लिया। ग़ज़ना और ग़ोर कम महत्वपूर्ण हो गए और दिल्ली अब क्षेत्रीय इस्लामी साम्राज्य का केंद्र बन गया। इतिहासकार सन् 1215 के बाद ग़ोरी साम्राज्य को पूरी तरह विस्थापित मानते हैं।
मुहम्मद गोरी के दास ने बंगाल एवं बिहार पर विजय प्राप्त की
मुहम्मद गोरी के एक साधारण दास इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी ने 1193 से 1202 ई. के मध्य बिहार की विजय की तथा नालंदा एवं विक्रमशिला विहार को तहस-नहस कर राजधानी उदन्तपुर पर कब्जा कर लिया। उसने 1198 से 1203 ई. के मध्य में बंगाल पर आक्रमण किया। उस समय वहां का शासक लक्ष्मणसेन था। वह बिना युद्ध किए ही भाग निकला।

तुर्की सेना ने राजधानी नदिया में प्रवेश कर बुरी तरह लूटपाट की। राजा की अनुपस्थिति में नगर ने आत्मसमर्पण कर दिया। लक्ष्मणसेन ने भाग कर पूर्वी बंगाल में शरण ली और वहीं कुछ समय तक शासन करता रहा। इख्तियारुद्दीन ने भी संपूर्ण बंगाल को जीतने का प्रयत्न नहीं किया। इख्तियारुद्दीन ने लखनौती को अपनी राजधानी बनाया।

बख्तियार खिलजी :

उसका पूरा नाम इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार खिलजी था। बिहार पर सबसे पहले विजय पाने वाला मुस्लिम शासक मोहम्मद बिन बख्तियार ख़िलजी ही था। उस समय बख्तियार खिलजी ने उत्तर भारत में बौद्धों द्वारा शासित कुछ क्षेत्रों पर कब्ज़ा कर लिया था और एक बार वह काफी बीमार पड़ा। उसने अपने हकीमों से काफी इलाज करवाया मगर वह ठीक नहीं हो सका और मरणासन्न स्थिति में पहुँच गया।

तभी किसी ने उसको सलाह दी कि वह नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र को दिखाए और इलाज करवाए। परन्तु खिलजी इसके लिए तैयार नहीं था. उसे अपने हकीमों पर ज्यादा भरोसा था। वह यह मानने को तैयार नहीं था की भारतीय वैद्य उसके हकीमों से ज्यादा ज्ञान रखते हैं या ज्यादा काबिल हो सकते हैं।  लेकिन अपनी जान बचाने के लिए उसको नालंदा विश्वविद्यालय के आयुर्वेद विभाग के प्रमुख आचार्य राहुल श्रीभद्र को बुलवाना पड़ा। फिर बख्तियार खिलजी ने वैद्यराज के सामने एक अजीब सी शर्त रखी और कहां की में उनके द्वारा दी गई किसी भी प्रकार की दवा नहीं खाऊं गा। बिना दवा के वो उसको ठीक करें। 

वैद्यराज ने सोच कर उसकी शर्त मान ली और कुछ दिनों के बाद वो खिलजी के पास एक कुरान लेकर पहुंचे और कहा कि इस कुरान की पृष्ठ संख्या.. इतने से इतने तक पढ़ लीजिये ठीक हो जायेंगे। 

बख्तियार खिलजी ने वैद्यराज के बताए अनुसार कुरान को पढ़ा और ठीक हो गया था।

ऐसा कहा जाता हैं कि राहुल श्रीभद्र ने कुरान के कुछ पन्नों पर एक दवा का लेप लगा दिया था, वह थूक के साथ उन पन्नों को पढ़ता गया और ठीक होता चला गया। खिलजी इस तथ्य से परेशान रहने लगा कि एक भारतीय विद्वान और शिक्षक को उनके हकीमों से ज्यादा ज्ञान था।

फिर उसने देश से ज्ञान, बौद्ध धर्म और आयुर्वेद की जड़ों को नष्ट करने का फैसला किया।

परिणाम स्वरूप खिलजी ने नालंदा की महान पुस्तकालय में आग लगा दी और लगभग 9 मिलियन पांडुलिपियों को जला दिया।

ऐसा कहा जाता है कि नालंदा विश्वविद्यालय में इतनी किताबें थीं कि वह तीन महीने तक जलती रहीं। इसके बाद खिलजी के आदेश पर तुर्की आक्रमणकारियों ने नालंदा के हजारों धार्मिक विद्वानों और भिक्षुओं की भी हत्या कर दी।

तबाकत-ए-नासिरी, फारसी इतिहासकार ‘मिनहाजुद्दीन सिराज’ द्वारा रचित की गई पुस्तक है। इसमें मुहम्मद ग़ोरी की भारत विजय तथा तुर्की सल्तनत के आरम्भिक इतिहास की लगभग 1260 ई. तक की जानकारी मिलती है। मिनहाज ने अपनी इस कृति को ग़ुलाम वंश के शासक नसीरूद्दीन महमूद को समर्पित किया था। उस समय मिनहाज दिल्ली का मुख्य क़ाज़ी था।

इस पुस्तक में ‘मिनहाजुद्दीन सिराज’ ने नालंदा विश्वविद्यालय के बारे में भी बताया है कि खिलजी और उसकी तुर्की सेना ने हजारों भिक्षुओं और विद्वानों को जला कर मार दिया क्योंकि वह नहीं चाहता था कि बौद्ध धर्म का विस्तार हो। वह इस्लाम धर्म का प्रचार प्रसार करना चाहता था। नालंदा की लाइब्रेरी में उसने आग लगवा दी, सारी पांडुलिपियों को जला दिया और कई महीनों तक आग जलती रही।

1204 ई. लगभग बख़्तियार ख़िलजी ने अपनी सेना के साथ बंगाल के सेन राजाओं की राजधानी ‘नदिया’ की ओर कूच किया। बहुत चोरी छिपे और घोड़ों के व्यापारी के रूप में उसने अपने अट्ठारह सैनिकों के साथ नदिया में प्रवेश किया। उस पर किसी ने संदेह नहीं किया क्योंकि उन दिनों तुर्की घोड़े व्यापारियों का देखा जाना आम बात थी।

महल तक पहुँचने के बाद बख़्तियार ख़िलजी ने एकाएक धावा बोल दिया और चारों तरफ खलबली मच गई। ‘लक्ष्मण सेन’ अपनी वीरता के लिए प्रसिद्ध था। लेकिन इस अचानक हमले से वह घबरा सा गया। यह सोचकर कि पूरी तुर्की सेना ही आ गई है, उसने पिछले दरवाज़े से भागकर सोनारगांव में शरण ली।

बिहार और बंगाल में विजयी होने के बाद बख़्तियार ख़िलजी की आकांक्षाएं बहुत बढ़ गईं।

10 हज़ार घुड़सवारों की सेना लेकर वह असम के रास्ते तिब्बत की ओर बढ़ा गया। वहां जिस राज्य की सेना से उसका सामना हुआ, उसमें बख़्तियार की फ़ौज टिक नहीं सकी।
10 हज़ार घुड़सवारों में से बचे हुए केवल 200 घुड़सवार लेकर उसे पीछे लौटना पड़ा।

बख़्तियार ख़िलजी का अंत :

इख्तियार-उद्दीन-मुहम्मद-बिन-बख्तियार खिलजी के शरीर को 1206 में पीरपाल में दफनाया गया था। पश्चिम बंगाल के दक्षिण दिनाजपुर जिले के गंगारामपुर ब्लॉक के पीरपाल गांव में बख्तियार खिलजी की कब्र है।

खिलजी पराक्रमी योद्धा था। पीरपाल में खिलजी की कब्र आजकल जीर्णावस्था में पड़ी है।

गांव के लोग आज भी मानते हैं कि वह पीर बाबा के रूप में अवतरित हुआ है। उसी के नाम पर गांव का नाम पीरपाल पड़ा।

बख्तियार खिलजी ने बंगाल पर अधिकार के बाद तिब्बत और चीन पर अधिकार की कोशिश की। उसे खबर मिली थी कि वे इलाके अधिक समृद्ध हैं। तिब्बत जाने के लिए बख्तियार ने ब्रह्मपुत्र या तीस्ता जैसी तेज बहाव वाली बड़ी पहाड़ी नदी पर बने पुल को पार किया।

उसके पास 10,000 सैनिकों की फौज थी। नदी पार करने के 15 दिन तक सेना पहाड़ी ऊंचे-नीचे और घुमावदार रास्तों को पार करती हुई, 16वें दिन तिब्बत पहुंची। वहां पहुंचकर खिलजी के सैनिकों ने लूटमार मचा दी। स्थानीय लोग बचाव के लिए इकट्ठा हो गए और जबरदस्त युद्ध हुआ। तिब्बती लोगों के पास भाले, ढाल, रक्षा कवच और धनुष-कमान थे। खिलजी के सैकड़ों सैनिक मारे गए।

इन हालात में खिलजी को वापस लौटना ही ठीक लगा। भूख से बेदम उसके सैनिक अपने घोड़ों को मारकर खाने लगे थे, लेकिन जब वे नदी के किनारे आए तो देखा कि कामरूप के हिंदूओं ने पुल को नष्ट कर दिया था। चौड़ी नदी को पार करने का कोई जरिया नहीं था।

हिंदूओं ने खिलजी के सैनिकों को खदेड़ना शुरू किया तो वे डर से अपने घोड़े नदी में  उतार दिए। नदी में पानी गहरा था। बख्तियार के अधिकांश सैनिक डूब गए। सिर्फ 100 सैनिकों के साथ खिलजी उस पार पहुंचा लेकिन देवकोट में आकर बीमार पड़ गया। कहा जाता है कि खिलजी के ही सिपहसालार अमीर अली मर्दान उसका हाल सुनकर वहां आया। उसने बेदम बख्तियार के पास पहुंचकर उसे चादर ओढ़ा दी और कटार से उसकी हत्या कर डाली। 

चंदावर के युद्ध

जयचंद्र / जयचंद (1170 – 94 ई.) को कन्नौज के राज्य की देख-रेख का उत्तराधिकारी उसके पिता विजयचंद्र ने अपने जीवन-काल में ही बना दिया था। विजयचंद्र की मृत्यु के बाद वह कन्नौज का विधिवत राजा हुआ। जयचंद्र पृथ्वीराज चौहान की पत्नी संयोगिता का पिता था। जयचंद्र बड़ा वीर, प्रतापी और विद्धानों का आश्रयदाता था।

उसने अपनी वीरता और बुद्धिमत्ता से कन्नौज राज्य का काफ़ी विस्तार किया था।

‘पृथ्वीराज रासो’ के अनुसार जयचंद्र दिल्ली के राजा अनंगपाल की पुत्री से उत्पन्न हुआ था। जयचंद्र द्वारा रचित ‘रंभामंजरी नाटिका’ से ज्ञात होता है कि इसने चंदेल राजा मदनवर्मदेव को पराजित किया।

इस नाटिका तथा ‘रासों’ से यह भी पता चलता है कि जयचंद्र ने शहाबुद्दीन ग़ोरी को कई बार पराजित कर उसे भारत से भगा दिया। मुसलमान लेखकों के विवरणों से ज्ञात होता है कि जयचंद्र के समय में गहड़वाल साम्राज्य बहुत विस्तृत हो गया। पूर्व में बंगाल के सेन राजाओं से जयचंद्र का युद्ध एक दीर्घकाल तक जारी रहा। गहड़वाल वंश के अंतिम शासक जयचंद को सेन नरेश लक्ष्मण सेन ने एक युद्ध में परास्त कर दिया। दिल्ली पर अधिकार को लेकर हुए संघर्ष में उसे चौहानों से पराजित होना पड़ा। दिल्ली तथा अजमेर का चौहान नरेश पृथ्वीराज तृतीय उसका समकालीन था। यह शैव धर्म का अनुयायी था। पुष्कर तीर्थ में उसने वाराह मन्दिर का निर्माण करवाया था।

कन्नौज की उन्नति :

जयचंद्र के शासन-काल में बनारस और कनौज की बड़ी उन्नति हुई। कन्नौज, असनी (जिला फतेहपुर) तथा बनारस में जयचंद्र के द्वारा मजबूत क़िले बनवाये गये। इसकी सेना बहुत बड़ी थी, जिसका लोहा सभी मानते थे। प्रसिद्ध ‘नैषधमहाकाव्य’ के रचयिता श्रीहर्ष जयचंद्र की राजसभा में रहते थे। जयचंद्र के द्वारा राजसूय यज्ञ करने का भी पता चलता है। अंत में वह मुसलमान आक्रमणकारी मुहम्मद ग़ोरी से पराजित होकर मारा गया था।

मुसलमानों द्वारा उत्तर भारत की विजय :

भारत की तत्कालीन प्रमुख शक्तियों में एकता न थी । गहड़वाल, चाहमान, चन्देल, चालुक्य तथा सेन एक-दूसरे के शत्रु थे। जयचंद्र ने सेन वंश के साथ लंबी लड़ाई कर अपनी शक्ति को कमज़ोर कर लिया। तत्कालीन चाहमान शासक पृथ्वीराज से उसकी घोर शत्रुता थी। इधर चंदेलों और चाहमानों के बीच अनबन थी।

1178 ई. के आस पास जबकि मुहम्मद ग़ोरी भारत-विजय की आकांक्षा से पंजाब में बढ़ता चला आ रहा था, पृथ्वीराज ने चंदेल-शासक परमार्दिदेव पर चढ़ाई कर उसके राज्य को तहस-नहस कर डाला। उसके बाद उसने चालुक्यराज भीम से भी युद्ध ठान दिया।

जिस स्थल पर जयचंद्र और मुहम्मद ग़ोरी की सेनाओं में वह निर्णायक युद्ध हुआ था, उसे ‘चंद्रवार’ कहा गया है। यह एक ऐतिहासिक स्थल है, जो अब आगरा ज़िला में फिरोजाबाद के निकट एक छोटे गाँव के रूप में स्थित है।

जयचंद्र की पराजय और वीर-गति :

मुहम्मद ग़ोरी द्वारा पृथ्वीराज चौहान के पराजित होने से मुसलमानों का आधिपत्य पंजाब से आगे दिल्ली के बड़े राज्य तक हो गया था।

उस विशाल भू-भाग पर अपना अधिकार स्थिर रखने के लिए ग़ोरी ने अपने सेनानायक कुतुबुद्दीन ऐबक को वहाँ का शासक नियुक्त किया। उसके बाद उसने कन्नौज के विरुद्ध अपना अभियान आरंभ किया।

कन्नौज का राजा जयचंद्र उस काल में सबसे शक्तिशाली हिन्दू नरेश था; किंतु उसकी शक्ति भी बंगाल के सेन राजाओं से निरंतर युद्ध करने से क्षीण हो गई थी। फिर भी उसने बड़ी वीरता से ग़ोरी की सेना का सामना किया; किंतु दुर्भाग्य से उसे भी में पराजित होना पड़ा था।

लक्ष्मण सेन :

बल्लाल सेन का उत्तराधिकारी लक्ष्मण सेन 1178 ई. में राजगद्दी पर बैठा। उसका शासन सम्पूर्ण बंगाल पर विस्तृत था। कुछ समय तक उसके राज्य सीमा दक्षिण-पूर्व में उड़ीसा और पश्चिम में वाराणसी, इलाहाबाद तक थी। उसके शासनकाल के अन्तिम चरण में उसके कई सामन्तों ने विद्रोह करके स्वतंत्र राज्य की स्थापना कर ली। 1202 ई. में इख्तियारुद्दीन मुहम्मद बिन बख्तियार ख़िलजी ने लक्ष्मण सेन की राजधानी लखनौती पर आक्रमण कर उसे नष्ट कर दिया।
इस घटना का वर्णन मिनहाज ने ‘तबकाते-नासिरी में किया है।
लक्ष्मण सेन स्वयं विद्वान था। उसने बल्लाल सेन द्वारा प्रारम्भ किये गये ‘उद्भुतद्भु सागर’ नामक ग्रन्थ की रचना को पूरा किया। श्रीधरदास उसका दरबारी कवि था। इसके अतिरिक्त जयदेव, जलायुध, धोई तथा गोवर्धन उसके दरबार को सुशोभित करते थे।

हलायुध उसका प्रधान न्यायाधीश तथा मुख्यमंत्री था। लक्ष्मणसेन वैष्णव धर्म का अनुयायी था। लेखों में उसे ‘परम भागवत’ की उपाधि प्रदान की गयी है। लक्ष्मणसेन के बाद विश्वरूप सेन तथा के शव सेन ने कमज़ोर उत्तराधिकारी के रूप में शासन किया।

लक्ष्मणसेन के राजदरबार में गीत गोविन्द के लेखक जयदेव, ब्राह्मण सर्वस्व के लेखक हलायुध एवं ‘पवनदुतम’ के लेखक धोई रहते थे।

भारत पर तुर्की आक्रमण सफल हुए

भारत पर तुर्कों का आक्रमण सफल हुआ, जिसके फलस्वरूप भारत में इस्लामी राज्य स्थापित हुआ। भारत भूमि में अंदर तक प्रवेश पाने का प्रथम श्रेय गजनवी वंश के सुल्तान महमूद को प्राप्त हुआ, जबकि भारत में राज्य स्थापित करने का श्रेय शंसबनी वंश के मुहम्मद गोरी को प्राप्त हुआ।

भारत में राजनीतिक एकता का अभाव और उत्तरी भारत में एक भी शक्तिशाली और विस्तृत साम्राज्य का न होना तुर्कों के विरुद्ध असफलता का कारण था। डॉ. ए.एल. श्रीवास्तव के अनुसार, राजनीतिक एकता का अभाव, सामाजिक विभेद, ब्राह्मणवाद का उत्थान, नैतिक पतन और भारतीयों की तुलना में तुर्कों की रणनीति, सैनिक संगठन, साधन आदि की दृष्टि से श्रेष्ठ होना तुर्की सफलता के कारण हैं।

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खिलजी वंश

कैकूबाद कैकूबाद तुर्क वंश का दिल्ली का सुलतान था। वह गयासुद्दीन बलबन का पौत्र था जो उसकी मृत्यु के पश्चात् 1286 ई. में 18 वर्ष की अवस्था में दिल्ली का सुलतान बना। विलासी होने के कारण वह शीघ्र ही दरबार के षड्यंत्रों का शिकार हुआ। 1288 ई. में जलालुद्दीन खिलजी ने उसकी हत्या कर गद्दी पर अधिकार कर लिया। खिलजी वंश(1290 ई.- 1320 ई.) : इतिहासकार ‘निज़ामुद्दीन अहमद’ ने ख़िलजी को चंगेज़ ख़ाँ का दामाद और कुलीन ख़ाँ का वंशज, ‘बरनी’ ने उसे तुर्कों से अलग एवं ‘फ़खरुद्दीन’ ने ख़िलजियों को तुर्कों की 64 जातियों में से एक बताया है। फ़खरुद्दीन के मत का अधिकांश विद्वानों ने समर्थन किया है। ‘फरुखदीन लिखित “तारीख-ए-फखरूदीन मुबारकशाही’ के अनुसार खिलजी वंश के सुल्तानों के पूर्वज तुर्की थे। अफगानिस्तान के हेलमन्द नदी की घाटी के प्रदेश को ‘खलजी’ के नाम से पुकारा जाता था। जो जातियां उस प्रदेश में बस गई उन्हें खलजी पुकारा जाने लगा। जलालुद्दीन के वंशज 200 वर्षों से भी अधिक उस प्रदेश में रहे उनके रहन सहन, रीति-रिवाज अफगानों की भांति हो गये और भारत में उन्हें अफगान समझा जाने लगा परन्तु खिलजी वंश...

उलगुलान विद्रोह 1899 से 1900

उलगुलान विद्रोह अथवा  बिरसा मुंडा उलगुलान विद्रोह 1899 से 1900 के बीच हुआ। नेतृत्व करता बिरसा मुंडा क्षेत्र - छोटा नागपुर (झारखंड - रांची खूंटी) पृष्ठभूमि  अंग्रेजों ने अंग्रेजों ने मुंडाओं की सूट कटिंग व्यवस्था को समाप्त कर जमीदारी व्यवस्था लागू कर दिया कर की दरें अधिक होने के कारण  मुंडाओं ने ईसाई मिशनरी से सहायता मांगी परंतु परंतु उन्हें धर्म परिवर्तन करने को कहा गया धर्म परिवर्तन करने के बाद भी कोई लाभ नहीं हुआ। 1895 में बिरसा मुंडा ने ईश्वर के दर्शन का दावा किया तथा 1895 में बिरसायित संप्रदाय की स्थापना की। 1895 में बिरसा मुंडा को गिरफ्तार कर 2 वर्ष की सजा दी गई। 1898 में जेल से रिहा होने के बाद 1899 में 6- 7 हजार मुंडाओं ने दीकू और अंग्रेजो के खिलाफ विद्रोह कर दिया। 3 मार्च उन्नीस सौ को बिरसा मुंडा को गिरफ्तार कर उलगुलान विद्रोह का अंग्रेजों द्वारा दमन कर दिया गया 9 जून उन्नीस सौ को बिरसा मुंडा की मृत्यु हो गई। विद्रोह का लाभ छोटा नागपुर काश्तकारी अधिनियम 1908 लागू किया गया (१) खूट खटी व्यवस्था को स्वीकार आ गया। (२) आदिवासी भूमिका स्थानांतरण गैर आदिवासी ...

लसोड़िया आंदोलन

लसोड़िया आंदोलन लसोड़िया आंदोलन” का क्षेत्र :- राजस्थान नेतृत्व करता :- (1).गोविंद गिरि, (2)सुर्जी भगत 19वीं सदी के उत्तरार्ध में सुर्जी भगत एवं गोविंद गिरि नामक समाज सुधारकों ने राजस्थान की मेवाड़, डूंगरपुर, बांसवाड़ा, प्रतापगढ़, सिरोही, पाली इत्यादि रियासतों में बसी भील जनजाति में सामाजिक सुधारों के प्रयास किए। गोविंद गिरि ने भीलों को संगठित करने के उद्देश्य से 1883 ई . में ‘सम्प सभा' की स्थापना की थी। गोविंद गिरि को लसोड़िया आंदोलन का प्रवर्तक माना जाता है। “मानगढ़ नरसंहार :- मानगढ़ नरसंहार की घटना राजस्थान से संबंधित है। मानगढ़ नरसंहार 17 नवम्बर वर्ष 1913 का है।मानगढ़ नरसंहार मै भील जनजाति के लगभग 1500 से अधिक लोग मारे गए थे इसे आदिवासी जलियाँवाला के नाम से जाना जाता है।  __________________________________________ महत्वपूर्ण प्रश्न :-   1. मेवाड़, बागड़ और पास के क्षेत्रों के भीलों में सामाजिक सुधार के िलए 'लसोड़िया आंदोलन' का सूत्रपात किसने किया? (a) भागीरथ माँझी (b) गोविंद गिरि (c) सिदो मूर्मू (d) सुरेंद्र साई उत्तर (b) गोविंद गिरि 2. “लसोड़िया आंदोलन” का क्षेत्र था - (...