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खिलजी वंश

कैकूबाद


कैकूबाद तुर्क वंश का दिल्ली का सुलतान था। वह गयासुद्दीन बलबन का पौत्र था जो उसकी मृत्यु के पश्चात् 1286 ई. में 18 वर्ष की अवस्था में दिल्ली का सुलतान बना।

विलासी होने के कारण वह शीघ्र ही दरबार के षड्यंत्रों का शिकार हुआ। 1288 ई. में जलालुद्दीन खिलजी ने उसकी हत्या कर गद्दी पर अधिकार कर लिया।


खिलजी वंश(1290 ई.- 1320 ई.) :

इतिहासकार ‘निज़ामुद्दीन अहमद’ ने ख़िलजी को चंगेज़ ख़ाँ का दामाद और कुलीन ख़ाँ का वंशज, ‘बरनी’ ने उसे तुर्कों से अलग एवं ‘फ़खरुद्दीन’ ने ख़िलजियों को तुर्कों की 64 जातियों में से एक बताया है। फ़खरुद्दीन के मत का अधिकांश विद्वानों ने समर्थन किया है। ‘फरुखदीन लिखित “तारीख-ए-फखरूदीन मुबारकशाही’ के अनुसार खिलजी वंश के सुल्तानों के पूर्वज तुर्की थे। अफगानिस्तान के हेलमन्द नदी की घाटी के प्रदेश को ‘खलजी’ के नाम से पुकारा जाता था। जो जातियां उस प्रदेश में बस गई उन्हें खलजी पुकारा जाने लगा।

जलालुद्दीन के वंशज 200 वर्षों से भी अधिक उस प्रदेश में रहे उनके रहन सहन, रीति-रिवाज अफगानों की भांति हो गये और भारत में उन्हें अफगान समझा जाने लगा परन्तु खिलजी वंश के सुल्तान मूल रूप से तुर्की ही थे। खिलजी महमूद गजनवी एवं मुहम्मद गोरी के समय भारत आए तथा दिल्ली के सुल्तानों के समय सेना एवं अन्य प्रशासनिक पदों पर नौकरी करने लगे तथा सल्तनत काल की अव्यवस्था का फायदा उठाकर सल्तनत के स्वामी बन बैठे । भारत के खिलजी वंश का संस्थापक जलालुद्दीन खिलजी था।

जलालुद्दीन खिलजी (1290 ई.- 1296 ई.) :

जलालुद्दीन फिरोजशाह खलजी बलबन का सर-ए-बहादौर (शाही अंगरक्षक) तथा कैकुबाद के शासन काल में (आरिज-ए-मुमालिक/सेना मंत्री) तथा सेनापति के पद पर पहुंच गया था।

1290 में फिरोजशाह खलजी ने कैकुबाद द्वारा बनवाए गए अपूर्ण किलोखरी (कूलागढ़ी) के महल में अपना राज्याभिषेक करवाया। जलालुद्दीन एक वृद्ध शासक था अतः उसने अपने दुश्मनों के विरुद्ध दुर्बल नीति अपनायी।

अगस्त 1290 में बलबन के भतीजे और कड़ा मानिकपुर (इलाहाबाद) के सूबेदार मिलक छज्जू ने विद्रोह कर दिया। दिल्ली पर अधिकार करने हेतु जब वह बढ़ा तो सुल्तान के पुत्र अर्कली खां द्वारा बदायूँ में वह पराजित हो गया और सुल्तान के भतीजे अलाउद्दीन खिलजी ने उसे पराजित करने में विशेष योगदान दिया। सुल्तान ने अलाउद्दीन खिलजी को कड़ा मानिकपुर का सूबेदार बना दिया।

1292 ई. में हलाकू (मंगोल नेता) के पौत्र अब्दुल्लाह के नेतृत्व में मंगोल आक्रमण हुआ परन्तु मंगोल पराजित हुए उनमें से कुछ मंगोलों ने इस्लाम धर्म स्वीकार कर लिया तथा दिल्ली के मुगलपुरा में बस गए ये नवमुसलमान कहलाये।

अलाउद्दीन खिलजी ने 1292/93 में मालवा में स्थित भिलसा के किले पर आक्रमण करके बहुत सारा धन लूटा तथा उसने धन का 1/5 भाग सुल्तान के पास भिजवा दिया जिससे सुल्तान ने खुश हो कर अलाउद्दीन को अवध का भी सूबेदार बना दिया। अलाउद्दीन खिलजी ने 1296 में महाराष्ट्र प्रांत के औरंगाबाद जिले में स्थित देवगिरी के यादव वंशी शासक रामचन्द्र देव के पुत्र शंकर देव को पराजित किया तथा काफी धन प्राप्त किया। अलाउद्दीन ने लूटे हुए धन का कोई हिस्सा सुल्तान को नहीं भेजा बल्कि सुल्तान को मानिकपुर बुलाकर स्वागत करने तथा धन देने की इच्छा प्रकट की।

सुल्तान जलालुद्दीन फिरोजशाह खिलजी मानिकपुर गंगा पार करके अलाउद्दीन से मिला एक षड्यंत्र के द्वारा सैनिक मो. सलीम ने अलाउद्दीन के इशारे पर सुल्तान को घायल किया और सैनिक इख्तियारुद्दीन हुद के द्वारा सुल्तान की हत्या कर दी गई।

जलालुद्दीन को मारने में अलाउद्दीन का भाई अलमास वेग भी शामिल था, जिसे बाद में ‘उलूग ख़ाँ’ की उपाधि से विभूषित किया गया।

रुकनुद्दीन इब्राहिम शाह (1296 ई.) :

सुल्तान जलालुद्दीन फिरोजशाह की मृत्यु के बाद विधवा मिलका-ए-जहान ने अपने छोटे बेटे क़द्र खां को रूकनुद्दीन इब्राहिम शाह के नाम से सुल्तान बनाया।

इससे उसका बड़ा पुत्र अर्कली खां नाराज हो गया। अलाउद्दीन ने इसका फायदा उठाकर इब्राहिम शाह को पराजित कर दिया तथा इब्राहिम शाह सपरिवार मुल्तान में अर्कली खां के यहां चला गया।

अलाउद्दीन ने बलबन के लाल महल पहुंचकर अपना राज्याभिषेक करवाया।

अलाउद्दीन खिलजी (1296 – 1316 ई.)

अलाउद्दीन खिलजी के पिता का नाम शिहाबुद्दीन खिलजी था जो जलालुद्दीन खिलजी का भाई था। जलालुद्दीन खिलजी ने अपनी पुत्री का विवाह अलाउद्दीन खिलजी से किया।
भिलसा, चन्देरी एवं देवगिरी पर सफल अभियानों से अलाउद्दीन खिलजी को अपार धन प्राप्त हुआ। अलाउद्दीन खिलजी को कड़ा मानकपुर में सुल्तान घोषित किया गया एवं राज्याभिषेक दिल्ली में बलबन के लाल महल में हुआ।
जियाउद्दीन बरनी ने उक्त कथन अलाउद्दीन खिलजी के लिए कहा है।

अलाउद्दीन दिल्ली का पहला सुल्तान था, जिसने धर्म पर राज्य का नियंत्रण स्थापित किया। इस संदर्भ में अपनी नीति की व्याख्या करते हुए वह स्वयं कहता है कि, “मैं नहीं जानता कि कानून की दृष्टि से क्या उचित है और क्या अनुचित? मैं राज्य की भलाई अथवा अवसर विशेष के लिए जो उपयुक्त समझता हूं, उसी को करने की आज्ञा देता हूं, अंतिम न्याय के दिन मेरा क्या होगा, मैं नहीं जानता।"

अलाउद्दीन ने राजपद के विषय में बलबन के विचार को पुनः जीवित किया। वह राजा की सार्वभौमिकता में विश्वास रखता था, जो पृथ्वी पर ईश्वर का प्रतिनिधि मात्र है। उसने अपनी शक्ति की वृद्धि के विषय में खलीफा की अनुमित लेना आवश्यक नहीं समझा।

इसलिए उसने खलीफा से अपने पद की मान्यता प्राप्त करने के संबंध में कोई याचना नहीं की।

अलाउद्दीन ख़िलजी (राज्यकाल- 1296-1316 ई.) दिल्ली का सुल्तान था। वह ख़िलजी वंश के संस्थापक जलालुद्दीन ख़िलजी का भतीजा और दामाद था। सुल्तान बनने के पहले उसे इलाहाबाद के निकट कड़ा की जागीर दी गयी थी। अलाउद्दीन ख़िलजी का बचपन का नाम अली ‘गुरशास्प’ था। उसके तख्त पर बैठने के बाद उसे “अमीर-ए-तुजुक’ (अनुष्ठान प्रमुख के समकक्ष) का पद मिला। मिलक छज्जू के विद्रोह को दबाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने के कारण जलालुद्दीन ने उसे कड़ा-मनिकपुर की सूबेदारी सौंप दी।

भिलसा, चंदेरी एवं देवगिरी के सफल अभियानों से प्राप्त अपार धन ने उसकी स्थिति और मजबूत कर दी। इस प्रकार उत्कर्ष पर पहुँचे अलाउद्दीन ख़िलजी ने अपने चाचा जलालुद्दीन की हत्या 22 अक्टूबर, 1296 को कर दी और दिल्ली में स्थित बलबन के लाल महल में अपना राज्याभिषेक सम्पन्न करवाया।

शासन व्यवस्था राज्याभिषेक के बाद उत्पन्न कठिनाइयों का सफलता पूर्वक सामना करते हुए अलाउद्दीन ने कठोर शासन व्यवस्था के अन्तर्गत अपने राज्य की सीमाओं का विस्तार करना प्रारम्भ किया। अपनी प्रारम्भिक सफलताओं से प्रोत्साहित होकर अलाउद्दीन ने ‘सिकन्दर द्वितीय’ (सानी) की उपाधि ग्रहण कर इसका उल्लेख अपने सिक्कों पर करवाया।
उसने विश्व-विजय एवं एक नवीन धर्म को स्थापित करने के अपने विचार को अपने मित्र एवं दिल्ली के कोतवाल ‘अलाउल मुल्क’ के समझाने पर त्याग दिया। यद्यपि अलाउद्दीन ने ख़लीफ़ा की सत्ता को मान्यता प्रदान करते हुए “यामिनी-उल-ख़िलाफ़त-नासिरी-अमीर-उल-मोमिनीन” की उपाधि ग्रहण की, किन्तु उसने ख़लीफ़ा से अपने पद की स्वीकृत लेनी आवश्यक नहीं समझी। उलेमा वर्ग को भी अपने शासन कार्य में हस्तक्षेप नहीं करने दिया। उसने शासन में इस्लाम धर्म के सिद्धान्तों को प्रमुखता न देकर राज्यहित को सर्वोपरि माना। अलाउद्दीन ख़िलजी के समय निरंकुशता अपने चरम सीमा पर पहुँच गयी।
अलाउद्दीन ख़िलजी ने शासन में न तो इस्लाम के सिद्धान्तों का सहारा लिया और न ही उलेमा वर्ग की सलाह ली।

अलाउद्दीन खिलजी एक महत्वाकांक्षी सुल्तान था। वह संपूर्ण विश्व को जीतने की अभिलाषा रखता था।

एक तरफ महत्वाकांक्षी शासक खिलजी ने जहां अपने शासनकाल में लूटपाट कर कई राज्यों पर अपना तानाशाह शासन चलाया तो वहीं उसने अपने राज में कई ऐसी सराहनीय व्यवस्थाएं भी लागू की, जिससे आम जनता को काफी फायदा हुआ और वह इतिहास में एक कुशल एवं सफल शासक के रुप में उभरा।

अलाउद्दीन खिलजी की शासनकाल की कुछ उपलब्धियां निम्नलिखित हैं–

अलाउद्दीन खिलजी दक्षिण भारत पर जीत हासिल करने वाला भारत का पहला मुस्लिम सुल्तान था।
अलाउद्दीन ने अपने शासनकाल में एक कुशल राजस्व प्रशासन की स्थापना की थी। उसके शासन के समय कृषि की स्थिति में काफी हद तक सुधार हुआ, भ्रष्टाचार के खिलाफ कड़े नियम बनाए गए, प्रशासनिक व्यवस्थाओं के लिए कई बड़े अधिकारियों एवं एजेंट को रोजगार पर रखा गया।

अलाउद्दीन खिलजी ने अपने शासनकाल में मूल्य नियंत्रण नीति लागू की, अलाउद्दीन ने कपड़े, अनाज और रोजमर्रा में इस्तेमाल होने वाली वस्तुओं की कीमत के मुताबिक उनके मूल्य निर्धारित किए, जिसका आम जनता और सिपाहियों को काफी फायदा हुआ।

अपनी क्रूरता के लिए मशहूर अलाउद्दीन खिलजी ने अपने शासन में एक ऐसी टैक्स प्रणाली लागू की थी, जिसे 19वीं और 20वीं सदी के शासकों ने भी अपने समय में जारी रखा था।
अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में शराब बिक्री, भांग खाना एवं जुआ खेलने पर पूरी तरह से रोक थी।

अलाउद्दीन खिलजी ने अपने शासनकाल में एक बेहतर टैक्स प्रणाली की भी शुरुआत की थी, जिसे 19वीं और 20वीं सदी तक के शासकों ने भी जारी रखा था। इसके साथ ही गुप्तचर विभाग की भी स्थापना की थी।

अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में रईस घरानों की घनिष्ठ मित्रता और आपस में शादी पर रोक थी ताकि ये घराने आपस में मिल कर संगठित विरोध न खड़ा कर पाएं।
खिलजी ने अपने शासनकाल में कृषि पर करीब 50 फीसदी टैक्स माफ कर दिया था, जिससे किसानों की हालत में काफी सुधार हुआ था।

अलाउद्दीन ख़िलजी के अभियान :

अलाउद्दीन ने गुजरात पर आक्रमण के दौरान जीत हासिल की, यहां मिलक काफूर उनके वफादार सेनापति बन गए थे।
1301 ईस्वी में अलाउद्दीन खिलजी को रणथंभौर की घेराबंदी के दौरान 3 बार हार का सामना करना पड़ा, हालांकि बाद में वह रणथंभौर पर अपनी सत्ता कायम करने में सफल रहा था।
1302 से 1303 ईसवी में अलाउद्दीन खिलजी ने राजपूत राजा रतन सिंह के राज्य चित्तौड़गढ़ पर आक्रमण किया था।
1308 ईसवी में खिलजी की सेना ने मेवाड़ के सिवाना किले पर अपना सिक्का जमा लिया।

1310 ईसवी में अलाउद्दीन खिलजी ने होयसल साम्राज्य पर भी विजय प्राप्त कर हासिल कर लिया।
1311 ईसवी में अलाउद्दीन की सेना ने मालाबार के इलाके में खूब लूटपाट की और उत्तर भारतीय राज्यों में अपना तानाशाह शासन चलाया।

विद्रोहों का दमन :

अलाउद्दीन ख़िलजी के राज्य में कुछ विद्रोह हुए, जिनमें 1299 ई. में गुजरात के सफल अभियान में प्राप्त धन के बंटवारे को लेकर “नवी मुसलमानों” द्वारा किये गये विद्रोह का दमन नुसरत ख़ाँ ने किया।

दूसरा विद्रोह अलाउद्दीन के भतीजे अकत ख़ाँ द्वारा किया गया। अपने मंगोल मुसलमानों के सहयोग से उसने अलाउद्दीन पर प्राण घातक हमला किया, जिसके बदलें में उसे पकड़ कर मार दिया गया।

तीसरा विद्रोह अलाउद्दीन की बहन के लड़के मलिक उमर एवं मंगू ख़ाँ ने किया, पर इन दोनों को हराकर उनकी हत्या कर दी गई।

चौथा विद्रोह दिल्ली के हाजी मौला द्वारा किया गया, जिसका दमन सरकार हमीद्दीन ने किया।

इस प्रकार इन सभी विद्रोहों को सफलता पूर्वक दबा दिया गया। अलाउद्दीन ने तुर्क अमीरों द्वारा किये जाने वाले विद्रोह के कारणों का अध्ययन कर उन कारणों को समाप्त करने के लिए 4 अध्यादेश जारी किये।

प्रथम अध्यादेश के अन्तर्गत अलाउद्दीन ने दान, उपहार एवं पेंशन के रूप में अमीरों को दी गयी भूमि को जब्त कर उस पर अधिकार कर लगा दिया, जिससे उनके पास धन का अभाव हो गया।

द्वितीय अध्यादेश के अन्तर्गत अलाउद्दीन ने गुप्तचर विभाग को संगठित कर “बरीद” (गुप्तचर अधिकारी) एवं “मुनहिम” (गुप्तचर) की नियुक्ति की।
तृतीय अध्यादेश के अन्तर्गत अलाउद्दीन ख़िलजी ने मद्यनिषेध, भाँग खाने एवं जुआ खेलने पर पूर्ण प्रतिबन्ध लगा दिया।
चौथे अध्यादेश के अन्तर्गत अलाउद्दीन ने अमीरों के आपस में मेल-जोल, सार्वजनिक समारोहों एवं वैवाहिक सम्बन्धों पर प्रतिबन्ध लगा दिया।

सुल्तान द्वारा लाये गये ये चारों अध्यादेश पूर्णतः सफल रहे। अलाउद्दीन ने खूतों, मुक़दमों आदि हिन्दू लगान अधिकारियों के विशेषाधिकार को समाप्त कर दिया।

अलाउद्दीन का प्रसिद्ध सेनापति जफर खां मंगोलों के विरुद्ध लड़ता हुआ मारा गया, जो अपने समय का श्रेष्ठ और साहसी सेनापति था। जफर खां के शौर्य और भारतीय सेना की दृढ़ता से मंगोल अत्यधिक प्रभावित थे।

अलाउद्दीन ख़िलजी के उत्तर भारत के अभियान

1. गुजरात की विजय (1297 ई.) –

अलाउद्दीन ने दिल्ली का सुल्तान बनने के 1 वर्ष बाद साम्राज्य विस्तार की ओर ध्यान दिया। अलाउद्दीन खिलजी ने अपने प्रमुख दो सेनानायक उलुग खां और नुसरत खां के नेतृत्व में एक विशाल सेना गुजरात पर आक्रमण करने के लिए भेजी। तब वहां की राजधानी अन्हिलवाड़ा थी। राजा कर्ण था, जो कि अलाउद्दीन खिलजी के सैनिकों के साथ सामना ना कर सका और अपनी पुत्री देवलदेवी को साथ लेकर दक्षिण की ओर भाग गया। उसने दक्षिण के देवगिरी के राजा रामचंद्र देव के यहां शरण ली। मुस्लिम सेना ने अन्हिलवाड़ा को बहुत लूटा। कर्ण देव की रानी कमला देवी आक्रमणकारियों के हाथ लगी, उसे दिल्ली भेज दिया गया। इसके बाद मुस्लिम सेना ने सोमनाथ के प्रसिद्ध मंदिर को नष्ट कर दिया तथा समुद्री बंदरगाह को भी लूटा।

2. रणथम्भौर की विजय (1299-1301 ई.) –

अलाउद्दीन का दूसरा आक्रमण रणथम्भौर के किले पर हुआ। रणथम्भौर राजपूतों का एक प्रसिद्ध दुर्ग था। यहां पृथ्वीराज चौहान द्वितीय का वंशज हमीर देव राज्य करता था। हमीर देव ने अनेक ऐसे मंगोलों को शरण दी थी जो दिल्ली साम्राज्य के शत्रु थे। उसके इस दुस्साहस के लिए दंड देना अलाउद्दीन आवश्यक समझता था। इसलिए सुल्तान ने उलुग खां और नुसरत खां को रणथम्भौर जीतने के लिए भेजा। शाही सेना ने झाईन का गढ़ जीत लिया। और रणथम्भौर के किले को चारों ओर से घेर लिया गया। राणा हमीर देव ने शत्रुओं का बड़ी वीरता से सामना किया और नुसरत खां को मार डाला। इस तरह हमीरदेव ने झाईन को पुनः जीत लिया। इस पराजय का समाचार सुनकर अलाउद्दीन को स्वयं रणथम्भौर के लिए प्रस्थान करना पड़ा।

इसी बीच अवसर पाकर उसके भतीजे अकत खां ने आक्रमण किया अलाउद्दीन के सहायकों की वजह से यह असफल रहा। इस घटना से सुल्तान भविष्य के लिए सावधान हो गया।

सुल्तान ने रणथम्भौर पहुंचकर किले पर मजबूत घेरा डलवा दिया। हमीरदेव ने लगभग 1 वर्ष तक डटकर मुकाबला किया। बाद में हमीर देव का प्रधानमंत्री रणमल सुल्तान से जाकर मिल गया उसकी सहायता से क़िले की दीवारों पर चढ़कर उस पर अधिकार कर लिया गया। हमीर देव एवं उनके परिवार के सभी सदस्यों को मौत के घाट उतार दिया गया। और उसके बाद में अलाउद्दीन ने रणमल का भी वध करवा दिया। और यहां का शासन उलुग खां को सौंप कर सुल्तान दिल्ली वापस लौट गया।

3. अन्य प्रदेशों की विजय (1305 ई.) –

अलाउद्दीन ने मालवा पर आक्रमण करने के लिए आईन-उल-मुल्क मुलतानी को भेजा। इस युद्ध में मालवा का राजा पराजित हुआ और मारा गया। इस विजय के परिणाम स्वरूप उज्जैन तथा चंदेरी पर खिलजी सेना का अधिकार हो गया। जालौर के राजपूत शासक कनेरदेव ने भी सुल्तान का आधिपत्य मान लिया।

1308 इसमें मारवाड़ पर आक्रमण किया और दिल्ली से दूर शक्तिशाली सिवाना को घेर लिया। घेरा दीर्घकाल तक चलता रहा फिर भी सफलता नहीं मिली। अब अलाउद्दीन स्वयं उस स्थान पर पहुंचा और इतनी तीव्रता से घेरे का संचालन किया कि मारवाड़ के राजा शीतलदेव को झुकना ही पड़ा। शीतलदेव ने सुल्तान के साथ संधि कर ली, इस संधि के अनुसार उसका किला उसके अधिकार में रहने दिया गया और शेष राज्य सुल्तान ने अपने अमीरों को बांट दिया।

इस प्रकार उत्तर भारत की विजय पूर्ण हुई और कश्मीर, नेपाल, आसाम तथा उत्तर पश्चिम, पंजाब के कुछ भाग को छोड़कर संपूर्ण उत्तरी भारत दिल्ली साम्राज्य में सम्मिलित हो गया अब सुल्तान ने दक्षिण की ओर ध्यान दिया।
अलाउद्दीन ख़िलजी के दक्षिण भारत के अभियान

1. देवगिरी की विजय I (1296) –

सर्वप्रथम 1296 में, अलाउद्दीन खिलजी (तब अली गुरशस्प के नाम से जाना जाता था) ने भारत के दक्कन क्षेत्र में यादव साम्राज्य की राजधानी देवगिरी पर छापा मारा । उस समय, अलाउद्दीन दिल्ली सल्तनत में कारा का राज्यपाल था, जिस पर जलालुद्दीन खिलजी का शासन था। अलाउद्दीन ने देवगिरी तक अपने मार्च को जलालुद्दीन से गुप्त रखा, क्योंकि वह इस छापे से प्राप्त धन का उपयोग सुल्तान को गद्दी से हटाने के लिए करना चाहता था।

जब अलाउद्दीन देवगिरी पहुंचा, तो यादव राजा रामचंद्र पहाड़ी किले में पीछे हट गए, और अलाउद्दीन की सेना ने निचले शहर को पूरी तरह से तबाह कर दिया। रक्षकों को घेराबंदी के लिए तैयार नहीं किया गया था, क्योंकि यादव सेना रामचंद्र के पुत्र सिम्हाना (शंकरदेव) के तहत एक अभियान पर थी और देवगिरी के किले में अपर्याप्त प्रावधान थे।

इसलिए, रामचंद्र अलाउद्दीन को एक बड़ी राशि की पेशकश करते हुए एक शांति संधि के लिए सहमत हुए।
हालांकि, सिम्हाना (शंकरदेव) जल्द ही राजधानी पहुंची और अलाउद्दीन को एक युद्ध में शामिल कर लिया। अलाउद्दीन विजयी हुआ, और यादवों को एक शांति संधि के लिए सहमत होने के लिए मजबूर किया। इस बार, यादवों को एक बहुत बड़ी युद्ध क्षतिपूर्ति का भुगतान करने के लिए मजबूर किया गया था, और अलाउद्दीन को अचलपुर प्रांत के राजस्व को श्रद्धांजलि के रूप में देना पड़ा ।

देवगिरी की विजय II (1306- 07 ई.) –

1306- 07 ई. में देवगिरी के शासक रामचंद्र देव ने सुल्तान को 3 वर्ष से कर देना बंद कर दिया था। दूसरे गुजरात के राजा करण देव तथा उसकी पुत्री देवल देवी को उसने अपने यहां शरण दी थी। इससे नाराज होकर सुल्तान ने अपने नाइब मिलक काफूर को देवगिरी पर आक्रमण करने के लिए भेजा। काफूर को यह आदेश दिया गया कि कर्ण की पुत्री देवलदेवी को पकड़कर दिल्ली लाया जाए। करण देव अपनी पुत्री का विवाह राम चंद्र देव के पुत्र शंकर देव से करना चाहता था।
जिस समय देवल देवी को देवगिरी ले जाया जा रहा था उसी समय मार्ग में वह गुजरात के गवर्नर अलप खां (अलाउद्दीन खिलजी का साला) के हाथों में पकड़ी गई जो इस आक्रमण में मिलक काफूर की सहायता के लिए जा रहा था। मिलक काफूर ने देवलदेवी को पकड़कर दिल्ली भेज दिया, जहां उसका विवाह सुल्तान के बेटे खिज्र खां से कर दिया गया। कर्णदेव ने भागकर देवगिरी में शरण ले ली। इसके बाद काफूर ने देवगिरी पर आक्रमण किया। राजा रामचंद्र देव ने बिना युद्ध किए ही आत्मसमर्पण कर दिया। राजा रामचंद्र देव ने दिल्ली जाकर सुल्तान को अपार धन भेंट किया।

2. वारंगल के काकतीय राज्य पर विजय (1309 ई. ) –

देवगिरी की विजय से उत्साहित होकर सुल्तान ने 1309 ई. में मालिक काफूर को वारंगल पर आक्रमण करने का आदेश दिया। वारंगल का दुर्ग अत्यंत सुदृढ़ था। फिर भी घेरा डाल दिया गया और मिलक काफ़ूर के सुदृढ़ घेरे ने राजा प्रताप रुद्र देव का साहस समाप्त कर दिया। अतः राजा ने विवश होकर आत्मसमर्पण कर दिया और 300 हाथी, 700 घोड़े तथा बहुत सा धन उपहार के रूप में दे दिया और वार्षिक कर देने का वचन भी दिया।

इस समस्त संपत्ति को लेकर मिलक काफूर दिल्ली लौट आया।
अमीर खुसरो के अनुसार मिलक काफूर ने अलाउद्दीन की सलाह अनुसार प्रताप रुद्रदेव से सारी सम्पत्ति मांगी। तब प्रताप रुद्रदेव ने काफूर को एक सौ हाथी, सात हजार घोड़े तथा काफी जवाहरात और ढले हुए सिक्के समर्पित कर दिये।
इतिहासकार खाफी खाँ के अनुसार, विश्व विख्यात “कोहिनूर हीरा” भी प्रताप रुद्र देव ने इसी अवसर पर मिलक काफूर को भेंट किया।

रानी पद्मिनी का नाम अलाउद्दीन की चित्तौड़ विजय पद्मिनी की कहानी का आधार 1540 ई. में मलिक मुहम्मद जायसी द्वारा लिखित काव्य- पुस्तक ‘पद्मावत’ है। इसके अनुसार, पद्मिनी चित्तौड़ के राजा रतन सिंह की अत्यंत सुंदर और विदुषी पत्नी थीं। अमीर खुसरो ने सुलेमान और रानी शैबा के प्रेम-प्रसंग का उल्लेख अपने ग्रंथ में किया था और उसने अपने संकेतों में अलाउद्दीन की समता सुलेमान से तथा पद्मिनी की तुलना शैबा से की थी। संभवतया इसी को आधार मानकर मलिक मुहम्मद जायसी ने पद्मावत की रचना की और राणा रतन सिंह की रानी पद्मिनी की कहानी बनी।

मेवाङ आक्रमण के समय अलाउद्दीन के साथ अमीर खुसरो गये थे। अमीर खुसरो मेवाङ के वैभव को देखते हुए कहा था, “हिन्दुओं का स्वर्ग सातवें स्वर्ग से ऊँचा है।“ शाही सेना ने लगभग आठ माह तक दुर्ग की घेराबन्दी रखी। जिस कारण चित्तौड़ दुर्ग में खाद्य सामग्री समाप्त होने लग गई। अब राजपूत सैनिक किले के द्वार खोल कर मुस्लिम सेना पर टूट पङे। राजा रतनसिंह के दो शक्तिशाली सेनापति गोरा व बादल वीरता पूर्वक शाही सेना का मुकाबला करते हुए वीरगति को प्राप्त हो गये।

साथ ही रतनसिंह भी इस संघर्ष में वीरगति को प्राप्त हो गये। तभी पद्मिनी ने लगभग 16000 राजपूत महिलाओं के साथ “अग्नि जौहर” कर लिया। अन्ततः 28 जनवरी 1303 ई. को सुल्तान चित्तौड़ के क़िले पर अधिकार करने में सफल हुआ। उसने चित्तौड़ का नाम ख़िज़्र ख़ाँ के नाम पर ‘ख़िज़्राबाद’ रखा और ख़िज़्र ख़ाँ को सौंप कर दिल्ली वापस आ गया।
इस जौहर का वर्णन अमीर खुसरो ने अपने ग्रंथ “खजाइन-उल-फुतुह” में किया। बाद में 16 वीं सदी में शेरशाह सूरी के समय मिलक मुहम्मद जायसी ने इसका वर्णन अपने ग्रंथ “पद्मावत” में किया था।

अलाउद्दीन की लगान व्यवस्था

अलाउद्दीन की लगान व्यवस्था संपूर्ण साम्राज्य में समान रूप से लागू नहीं की जा सकती थी। भूमि की पैमाइश करके किसानों से सरकारी कर्मचारियों द्वारा लगान वसूल किए जाने की व्यवस्था दिल्ली और उसके समीपवर्ती क्षेत्रों में ही लागू की गई थी। अलाउद्दीन पहला सुल्तान था जिसने भूमि की पैमाइश करा कर लगान वसूल करना आरंभ किया। अपनी व्यवस्था को लागू करने के लिए अलाउद्दीन ने एक पृथक विभाग “दीवान-ए-मुस्तखराज” की स्थापना की।

अलाउद्दीन ने परंपरागत लगान अधिकारियों (खुत्त, मुकद्दम एवं चौधरी) से लगान वसूल करने का अधिकार छीन लिया था। उनके सारे विशेषाधिकार समाप्त कर दिए गए। उनकी भूमि पर से कर लिया जाने लगा और बाकी अन्य सभी कर भी लिए गए जिसके कारण खुत्त (जमींदार) और बलाहार (साधारण किसान) में कोई अंतर नहीं रहा।

अलाउद्दीन खिलजी की राजस्व / कृषि सुधार :

उसका पहला राजस्व नियमन खेती योग्य भूमि के माप से संबंधित था। इसके तहत खेती योग्य भूमि के माप के लिए “बिस्वा” को मानक इकाई घोषित किया गया था।
गंगा और यमुना के बीच के क्षेत्र अर्थात “दोआब” में “पैमाइश” (माप) के आधार पर उत्पाद के आधे हिस्से पर भू-राजस्व (खराज) निर्धारित किया गया था। भू-राजस्व संग्राहक का क्रम इस प्रकार था- राय, राणा, रावत (शीर्ष स्तर पर) और खुत, मुक्द्दम, चौधरी (ग्रामीण स्तर पर)।

आवास कर (घरी) और चरागाह कर (चरी) भी लगाए गए थे। भूमि राजस्व नकद में वसूल किया जाता था।

अलाउद्दीन खिलजी ने एक नए राजस्व विभाग “दीवान-ए-मुस्तखराज” की स्थापना की थी। अलाउद्दीन खिलजी के समय में एक नए बिचौलिये वर्ग “खुत” की शुरूआत हुई, जो “परगना” या “शिक” (जिला) स्तर पर काम-काज देखता था। इन्हें “जमींदार” के रूप में सर्वप्रथम “अमीर खुसरो” ने संदर्भित किया थाl

राज्य में चार महत्वपूर्ण मन्त्री थे जो राज्य के चार स्तम्भ माने जाते थे –

1. दीवान-ए-वजारत : यह मुख्य मन्त्री होता था। इसे वजीर भी कहा जाता था।

2. दीवान-ए-अर्ज : यह दूसरा महत्वपूर्ण पद था। इसके मुख्य कार्य सैनिकों की भर्ती करना, उनके प्रशिक्षण व वेतन की व्यवस्था करना, युद्ध में साथ जाना व लूट का माल सम्भालना आदि थे। उसके अधीन नायब-आरिज-ए-मुमालिक (उपाधिकारी) होता था।

3. दीवान-ए-इंशा : यह तीसरा मुख्य पद था। इसके प्रमुख कार्य शाही उद्घोषणाओं और प्रपत्रों का प्रारूप बनाना, सरकारी कार्यों का लेखा-जोखा रखना प्रान्तपतियों व स्थानीय अधिकारियों से पत्र-व्यवहार करना आदि थे।
इसके अधीन दबीर या सचिव होते थे। मुख्य दबीर आमतौर पर “दबीर-ए-खास” सुल्तान का निजी सचिव) होता था जो पत्र-व्यवहार का कार्य व “फ़तेहनामा” (विजयों का लेखा-जोखा) तैयार करता था।

4. दीवान-ए-रसालत : यह विदेशी विभाग तथा कूटनीतिक पत्र-व्यवहार से सम्बन्ध रखता था। इस विभाग को सुल्तान स्वयं देखता था और उसने किसी भी अमीर को यह विभाग नहीं सौंपा।

दीवान-ए-रियासत (नया विभाग) : अलाउद्दीन खिलजी ने यह एक नया मन्त्रालय खोला जिसके अधीन राजधानी के आर्थिक मामले थे। वह बाजार की सम्पूर्ण व्यवस्था का संघीय मंत्री या अधिकारी होता था।

“याकूब” को इस पद पर नियुक्त किया गया था।
राजमहल के कार्यों की देख-रेख “वकील-ए-दर” करता था। “वकील-ए-दर” के बाद “अमीर-ए-दाजिब” (उत्सव अधिकारी) का पद आता था।

कुछ अन्य अधिकारी भी थे जैसे-सर ए जहांदार (सुल्तान के अंग रक्षकों का नायक), “अमीर-ए-आखूर” (अश्वाधिपति), “शहना-ए-पील” (गजाध्यक्ष), “अमीर-ए-शिकार” (शाही आखेट का अधीक्षक), “शराबदार” (सुल्तान के पेयों का प्रभारी), “मुहरदार” (शाही मुद्रा-रक्षक) आदि।

अलाउद्दीन खिलजी की प्रशासनिक व्यवस्था

न्याय प्रशासन : सुल्तान अपील की मुख्य अदालत था। उसका फैसला अन्तिम होता था। उसके बाद “सद्र ए-जहाँ काजी उल कुजात” मुख्य न्यायाधिकारियों होता था। उसके अधीन नायब काजी कार्य करते थे और उनकी सहायता के लिए “मुफ्ती” होते थे। गाँवों में मुखिया और पंचायतें झगड़ों का निपटारा करती थीं। “अमीर-ए-दाद” नामक अधिकारी दरबार में ऐसे प्रभावशाली व्यक्तियों को प्रस्तुत करता था जिन पर काजियों का नियंत्रण नहीं होता था।

पुलिस एवं गुप्तचर व्यवस्था : अलाउद्दीन खिलजी ने पुलिस व गुप्तचर विभाग को कुशल व प्रभावशाली बनाया। कोतवाल शांति व कानून का रक्षक था तथा वह ही मुख्य पुलिस अधिकारी था।

गुप्तचर विभाग का प्रमुख अधिकारी “बरीद-ए-मुमालिक” होता था। उसके नियन्त्रण में अनेक बरीद (संदेश वाहक) कार्य करते थे। बरीद के अतिरिक्त अन्य सूचना दाता को “मुनहियन” तथा “मुन्ही” कहा जाता था।

डाक-व्यवस्था : अलाउद्दीन खिलजी ने साम्राज्य के विभिन्न भागों से सम्पर्क बनाए रखने के लिए उचित डाक-व्यवस्था का प्रबन्ध किया। उसने अनेक घुड़सवारों और क्लर्कों को डाक चौकियों में नियुक्ती किया।

सैनिक प्रबन्ध : सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी ने साम्राज्य विस्तार, आन्तरिक विद्रोहों को कुचलने तथा बाह्य आक्रमणों का सामना करने हेतु एक विशाल, सुदृढ़ तथा स्थाई साम्राज्य स्थापित करने के लिए सैनिक व्यवस्था की ओर पर्याप्त ध्यान दिया। उसने बलबन की तरह प्राचीन किलों की मरम्मत करवाई और कई नए दुर्ग बनवाए।
घोड़ों को दागने तथा सैनिकों का हुलिया दर्ज करवाने के नियम बनाए। वह पहला सुल्तान था जिसने एक विशाल स्थाई सेना रखी।
उसने सैनिकों को नकद वेतन देने की प्रथा चलाई तथा वृद्ध सैनिकों को सेवानिवृत करके उन्हें पेंशन दी।

“दीवान-ए-आरिज” प्रत्येक सैनिक का हुलिया रखता था।
कर प्रणाली : सुल्तान ने भूमिकर की दर 25% तथा 30% से बढ़ा कर 50% कर दी।

“जजिया” भी लिया जाता था। सम्भवतः ब्राह्मणों, स्त्रियों, बच्चों, पागलों और निर्बलों से जजिया नहीं लिया जाता था।
मुसलमानों से “जकात” (धार्मिक कर) के रूप में सम्पत्ति का 1/40वां भाग लिया जाता था।

खम्स (युद्ध में लूट के माल का भाग) राज्य की आय का महत्वपूर्ण साधन बन गया था क्योंकि इसमें राज्य का भाग 1/5 से बढ़ा कर 4/5 कर दिया गया था।
आवास तथा चराई कर भी लिए जाते थे।

'बाजार सुधार’

सल्तनत काल में अलाउद्दीन खिलजी द्वारा ‘बाजार नियंत्रण’ या ‘मूल्य नियंत्रण पद्धति थे लागू किया गया था। अलाउद्दीन ने केंद्र में एक बड़ी और स्थायी सेना रखी तथा उसे नगद वेतन दिया। ऐसा करने वाला वह दिल्ली का पहला सुल्तान था। उस सेना का व्यय बहुत अधिक था। बरनी के अनुसार-“यदि उतनी बड़ी सेना को साधारण वेतन भी दिया जाता, तो राज्य का खजाना पांच या छः वर्ष में ही समाप्त हो जाता।“ अतः अलाउद्दीन ने सेना के खर्च में कमी करने के लिए सैनिकों के वेतन में कमी की। परंतु उसके सैनिक सुविधापूर्वक रह सकें, इसके लिए उसने वस्तुओं के मूल्य निश्चित किए और उनकी दरें कम कर दी।

अलाउद्दीन खिलजी के आर्थिक सुधारों के सम्बन्ध में हमें तत्कालीन जानकारी जियाउद्दीन बरनी की पुस्तक “तारीखे-फिरोजशाही”, अमीर खुसरो की पुस्तक “खजाइन-उल-फुतुह”, इब्नबतूता की पुस्तक “रेहला” तथा इसामी की पुस्तक “फुतूह-उस-सलातीन” से प्राप्त होती है।

सैनिकों को नकद में वेतन देने की शुरुआत ने कीमत विनियमन के लिये प्रेरित किया जिसे सार्वजनिक रूप से बाज़ार सुधार के नाम से जाना जाता है।

अलाउद्दीन खिलजी ने दिल्ली में चार अलग-अलग बाज़ारों की स्थापना की जिनमें पहला अनाज के लिये; दूसरा कपड़ा, चीनी, सूखे फल, मक्खन और तेल के लिये; तीसरा घोड़ों, दासों और पशुओं के लिये तथा चौथा विविध वस्तुओं के लिये था।
अफसर काफी सावधानीपूर्वक कीमतों का सर्वेक्षण करते थे और निश्चित दरों का उल्लंघन करने वाले व्यापारियों को सज़ा मिलती थी।

यहाँ तक कि अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल में अकाल के दौरान भी उसी कीमत को बनाए रखा गया था।
अलाउद्दीन ने बाजार नियंत्रण नीति में कुल चार बाजार स्थापित किये- गल्ला मण्डी, सराय-ए-अदल, घोड़ों, दासों एवं मवेशियों का बाजार एवं सामान्य बाजार। इनमें गल्ला-ए-मण्डी सबसे सफल रही।

1. गल्ला बाजार (अनाज मंडी) – इस बाजार में विभिन्न प्रकार के अनाज राज्य द्वारा तय किये गये मूल्यों पर बेचे जाते थे। इस बाजार का प्रमुख शहना-ए-मण्डी होता था। इस बाजार में वे व्यापारी ही अनाज बेचते थे जो शहना-ए-मंडी के दफ्तर में नामांकित (रजिस्टर्ड) हो। इस बाजार में अनाजों की आपूर्ति सुलभ कराने के लिये अलाउद्दीन ने नकद की बजाय भू-राजस्व में अनाज के रूप में कर वसूला तथा बंजारों को गांवों से इन मंडियों तक अनाज लाने के लिये अधिकृत किया। अलाउद्दीन खिलजी के समय शहना-ए-मंडी के पद पर मलिक काबुल स्थापित था।

2. सराय-अदल (कपड़ा बाजार) – इस बाजार में विभिन्न प्रकार के कपड़ों के अलावा जड़ी-बूटी, घी, तेल आदि वस्तुयें भी बेची जाती थी। इस का प्रमुख राय परवाना कहलाता था। इस बाजार में कुछ विशेष प्रकार के वस्त्रों को बेचा जाता था जैसे- तस्बीह, तबरेज, कंजभावरी, सुनहरी जरी, खुज्जे-दिल्ली, सिलहटी, सीरी-ए-बाफ्ता, कमरबाद। इस बाजार में अलाउद्दीन ने मुल्तान के रेशमी कपड़े के व्यापारियों को कम कीमत पर रेशमी वस्त्र बेचने के लिये 20 लाख टंके की सब्सीडी प्रदान की थी।

3. घोड़े, गुलामों तथा पशुओं का बाजार – इस बाजार में अलग-2 किस्म के घोड़ों, पशुओं तथा गुलामों की दर तय की गई तथा बिचौलियों को बाजार से हटाने का प्रयास किया, क्योंकि इनके कारण वस्तुओं के मूल्यों में काफी उतार – चढ़ाव होता था, लेकिन इसमें अलाउद्दीन पूर्णतः सफल नहीं हुआ।

4. सामान्य बाजार – बड़े बाजारों के अतिरिक्त छोटी-छोटी वस्तुओं के दाम भी निश्चित थे। जैसे – मिठाई, सब्जी, टोपी, मोजा, चप्पल, कंघी आदि।

अलाउद्दीन ने मूल्य नियंत्रण की नीति लागू की। अलाउद्दीन ने अपने बाजार नियंत्रण की सफलता के लिए कुशल कर्मचारी नियुक्त किए। उसने मलिक कबूल को शहना या बाजार।का अधीक्षक नियुक्त किया। उसके कार्य में सहायता देने के लिए घुड़सवारों और पैदल व्यक्तियों की विशाल टुकड़ी दी गई। उसे विस्तृत अधिकार दिए गए।

वह सारे व्यापारियों पर नियंत्रण रखता था और बाजार की कीमतों पर उतार-चढ़ाव तथा बाजार की सामान्य स्थिति की सूचना सुल्तान को देता था। बरनी इन बाजार सुधारों का उद्देश्य मंगोलों के विरुद्ध एक विशाल सेना तैयार करना तथा हिंदूओं में विद्रोह के विचार न पनपने देना बताता है।

'सार्वजनिक वितरण प्रणाली'

सल्तनत कालीन शासक अलाउद्दीन खिलजी ने ‘सार्वजनिक वितरण प्रणाली’ प्रारंभ की थी।

दोआब तथा अन्य क्षेत्रों से भूमिकर अनाज के रूप में एकत्रित किया गया। इस व्यवस्था से दिल्ली में इतना अनाज पहुंच गया कि अकाल और सूखा पड़ने आदि की अवस्था का दिल्ली के निवासियों को पता भी नहीं चलता था।

एहितकार (चोर-बाजारी) का सख्ती से निषेध कर दिया गया।
मुतसरिफों तथा शहनों को सख्त आदेश थे कि प्रजा से इस कठोरता से खराज वसूल करें कि वह अनाज खलिहान से अपने घरों में लाकर एहितकार न कर सकें।

अकाल आदि का सामना करने के लिए राजकीय अन्नागार स्थापित किए गए। राशनिंग की व्यवस्था अलाउद्दीन खिलजी की नई सोच थी।

अकाल के समय प्रत्येक परिवार को आधा मन अनाज प्रतिदिन दिया जाता था। राशन-कार्ड व्यवस्था लागू नहीं थी। सम्भवतः राशन वितरण के समय परिवार को कुल सदस्य संख्या पर ध्यान नहीं दिया जाता था। 1 मन में 40 किलो ग्राम होता है।

अलाउद्दीन खिलजी के समय में दिल्ली के सुल्तान तथा मंगोलों के बीच सीमा

1306 ई. के बाद अलाउद्दीन खिलजी के समय में दिल्ली सल्तनत एवं मंगोलों के बीच सीमा रावी नदी थी। 1306 ई. में कबक के नेतृत्व में मंगोल आक्रमण हुआ, जिसे रावी नदी के तट पर मलिक काफूर और गाजी मलिक द्वारा रोक दिया गया था और रावी नदी मंगोल और खिलजी साम्राज्य की सीमा बन गई थी।

अलाउद्दीन खिलजी के समय हुये आक्रमण निम्नलिखित हैं –

1. प्रथम मंगोल आक्रमण- 1297-98 ई. में प्रथम मंगोल आक्रमण कादर-खाँ के नेतृत्व में हुआ, जो मंगोलों का सेनानायक था तथा मध्य एशिया में ट्रांसऑक्सियाना का शासक दावा खाँ था। इस दोनों ने मुल्तान को लूटा।

2. द्वितीय मंगोल आक्रमण- यह 1299 ई. में सलदी के नेतृत्व में हुआ था।

3. तृतीय मंगोल आक्रमण- 1299 ई. में कुतलुग ख्वाजा, तार्गी के नेतृत्व में आक्रमण हुआ। इस आक्रमण में तार्गी ने जाफर खाँ को मार डाला था।

4. पांचवाँ आक्रमण – 1303 ई. में अलीबेग, तर्ताक, तार्गी के नेतृत्व में आक्रमण किया गया, लेकिन मलिक काफूर, गाजी मलिक (गयासुद्दीन तुगलक) ने मंगोलों को पराजित किया तथा तीनों सेनानायकों को मार दिया।

5. छठा आक्रमण – 1306 ई. में कबक, इकबालमंद, ताइ-बूके नेतृत्व में आक्रमण किया गया लेकिन इस बार भी काफूर व गाजी मलिक ने मंगोलों को हराया।
सुल्तान अलाउद्दीन खिलजी के समय अन्तिम मंगोल आक्रमण (Mongol invasion) इकबालमन्द के नेतृत्व में 1308 ई. में हुआ।

मगर वह गाजी मलिक (गयासुद्दीन तुगलक) द्वारा रावी नदी के तट पर पराजित हुआ व मारा गया।

इस प्रकार अलाउद्दीन खिलजी ने अपने शासन काल में मंगोलों के सबसे अधिक एवं सबसे भयानक आक्रमणों का सामना करते हुए सफलता प्राप्त की।

अलाउद्दीन ख़िलजी के मंगोल आक्रमण से सुरक्षा के उपाय :

1. उत्तर-पश्चिम में स्थित किलों की मरम्मत करवाई और उन किलों में अनाज व चारे की भरपूर व्यवस्था की।

2. सुनाम, समाना व भटिण्डा में पेशेवर सैनिकों की संख्या बढाई तथा मंगोलों से युद्ध करने के अनुभव रखने वाले सेनानायकों को नियुक्त किया।

3. दीपालपुर में गाजी मलिक (ग्यासुद्दीन तुगलक) को नियुक्त किया।

4. अलाउद्दीन ने उत्तर-पश्चिम के किलों में नवीन तकनीकी के हथियार रखे जैसे –
अरदास, चरख।

शिहाबुद्दीन उमर ख़िलजी (1316 ई०) :

शिहाबुद्दीन उमर ख़िलजी, अलाउद्दीन ख़िलजी का पुत्र था। मलिक काफ़ूर के कहने पर अलाउद्दीन ने।अपने पुत्र ‘खिज्र ख़ाँ को उत्तराधिकारी न बना कर अपने 5-6 वर्षीय पुत्र शिहाबुद्दीन उमर को उत्तराधिकारी नियुक्त कर दिया। अलाउद्दीन की मृत्यु के बाद काफ़ूर ने शिहाबुद्दीन को सुल्तान बना कर सारा अधिकार अपने हाथों में सुरक्षित कर लिया। लगभग 35 दिन के सत्ता उपभोग के बाद काफ़ूर की हत्या अलाउद्दीन के तीसरे पुत्र मुबारक ख़िलजी ने करवा दी। काफ़ूर की हत्या के बाद वह स्वयं सुल्तान का संरक्षक बन गया और कालान्तर में उसने शिहाबुद्दीन को अंधा करवा कर क़ैद करवा दिया।

कुतुबुद्दीन मुबारक ख़िलजी (1316 – 1320 ई०) :

कुतुबुद्दीन मुबारक ख़िलजी (1316-1320 ई.) ख़िलजी वंश के सुल्तान अलाउद्दीन ख़िलजी का तृतीय पुत्र था।
अलाउद्दीन के प्रभावशाली व्यक्तियों में से एक मलिक काफ़ूर इसका संरक्षक था। कुछ समय बाद मिलक काफूर स्वयं सुल्तान बनने का सपना देखने लगा और उसने षड़यंत्र रचकर मुबारक ख़िलजी की हत्या करने की योजना बनाई। किंतु मलिक काफ़ूर के षड्यंत्रों से बच निकलने के बाद मुबारक ख़िलजी ने चार वर्ष तक सफलतापूर्वक राज्य किया।
इसके शासनकाल में राज्य में प्राय: शांति व्याप्त रही।

कार्य :

उसने राजनीतिक बंदियों को रिहा कर दिया।
अपने सैनिकों को छः माह का अग्रिम वेतन देना प्रारम्भ किया।
विद्वानों एवं महत्त्वपूर्ण व्यक्तियों की छीनी गयीं सभी जागीरें उन्हें वापस कर दीं।

अलाउद्दीन ख़िलजी की कठोर दण्ड व्यवस्था एवं “बाज़ार नियंत्रण प्रणाली” आदि को भी समाप्त कर दिया और जो कठोर क़ानून बनाये गए थे, उन्हें समाप्त करवा दिया।

उपाधियाँ :

कुतुबुद्दीन मुबारक ख़िलजी ने (अल इमाम”, ‘उल इमाम” एवं ‘ख़िलाफ़त-उल्लाह” की उपाधियाँ धारण की थीं। उसने ख़िलाफ़त के प्रति भक्ति को हटाकर अपने को “इस्लाम धर्म का सर्वोच्च प्रधान” और (स्वर्ग तथा पृथ्वी के अधिपति का ख़लीफ़ा) घोषित किया।

मृत्यु :

देवगिरी तथा गुजरात की विजय से मुबारक ख़िलजी का दिमाग फिर गया और वह भोग-विलास में लिप्त रहने लगा।
उसके प्रधानमंत्री ख़ुसरों ख़ाँ ने 1320 ई. में उसकी हत्या करवा दी।

नासिरुद्दीन खुसरवशाह (1320 ई०) :

नासिरुद्दीन खुसरवशाह हिन्दू से मुसलमान बना हुआ था और 15 अप्रैल से 27 अप्रैल, 1320 ई. तक दिल्‍ली सल्तनत में खिलज़ी वंश का अंतिम शासक था। इसकी हत्या कर के दिल्‍ली सल्तनत में ख़िलजी का अंत हो गया।

इस वंश के बाद दिल्‍ली सल्तनत में तुगलक़ वंश का उदय हुआ।

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