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मुगल साम्राज्य का उदय - बाबर

बाबर का भारत पर आक्रमण -

आलम खां, इब्राहिम लोदी का चाचा था। उसने दिल्ली के राजसिंहासन पर अपना अधिकार जताते हुए बाबर को भारत पर आक्रमण के लिए आमंत्रित किया। 1524 ई. में बाबर के चौथी बार भारत अभियान के दौरान दिल्ली के सुल्तान इब्राहिम लोदी तथा पंजाब के गवर्नर दौलत खां के मध्य कटु संबंध हो गए थे। सुल्तान इब्राहिम लोदी ने दौलत खां को राजधानी आने का आदेश दिया था, जिसका दौलत खां ने उल्लंघन किया था। दौलत खां ने अपने पुत्र दिलावर खां को बाबर के पास इस संदेश के साथ भेजा कि वह सुल्तान इब्राहिम लोदी को दिल्ली के सिंहासन से अपदस्थ कर उसके स्थान पर उसके चाचा आलम खां को पदस्थ करने में सहायता करें। बाबर के लिए यह स्वर्णिम अवसर था क्योंकि उसे मेवाड़ के राजा राणा सांगा का भी निमंत्रण प्राप्त हो चुका था। अतः बाबर को यह विश्वास हो गया कि भारत-विजय का अवसर आ गया है।

ज़हीरुद्दीन मुहम्मद बाबर :

14 फ़रवरी, 1483 ई. को फ़रग़ना में ‘ज़हीरुद्दीन मुहम्मद बाबर’ का जन्म हुआ। बाबर अपने पिता की ओर से तैमूर का पाँचवां एवं माता की ओर से चंगेज़ ख़ाँ (मंगोल नेता) का चौदहवाँ वंशज था। उसका परिवार तुर्की जाति के ‘चग़ताई वंश’ के अन्तर्गत आता था।
बाबर अपने पिता ‘उमर शेख़ मिर्जा की मृत्यु के बाद 11 वर्ष की आयु में शासक बना। उसने अपना राज्याभिषेक अपनी दादी “ऐसान दौलत बेगम” के सहयोग से करवाया। बाबर ने अपने फ़रग़ना के शासन काल में 1501 ई. में समरकन्द पर अधिकार किया, जो मात्र आठ महीने तक ही उसके क़ब्ज़े में रहा।
1504 ई. में क़ाबुल विजय के उपरांत 1507 ई. में बाबर ने अपने पूर्वजों द्वारा धारण की गई उपाधि “मिर्जा” का त्याग कर नई उपाधि “पादशाह” धारण की।

बाबर के भारत अभियान :

बाबर का भारत के विरुद्ध किया गया प्रथम अभियान 1519 ई. में ‘युसूफजई’ जाति के विरुद्ध था। इस अभियान में बाबर ने “बाजौर” (वर्तमान खैबर पख़्तून (अफगानिस्तान सीमा)) और “भेरा” (वर्तमान पाकिस्तान का पंजाब प्रांत) को अपने अधिकार में किया। यह बाबर का प्रथम भारतीय अभियान था, जिसमें उसने तोपखाने का प्रयोग किया था।
1519 ई. के अपने दूसरे अभियान में बाबर ने “बाजौर” और “भेरा” को पुनः जीता साथ ही “स्यालकोट” (वर्तमान पाकिस्तान) एवं “सैय्यदपुर” को भी अपने अधिकार में कर लिया।
1524 ई. के अभियान के अन्तर्गत इब्राहीम लोदी एवं दौलत ख़ाँ लोदी के मध्य मतभेद हो जाने के कारण दौलत ख़ाँ, जो उस समय लाहौर का गवर्नर था, ने पुत्र दिलावर ख़ाँ एवं आलम ख़ाँ (बहलोल ख़ाँ का पुत्र) को बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए आमंत्रित करने के लिए भेजा। सम्भवतः इसी समय राणा सांगा ने भी बाबर को भारत पर आक्रमण करने के लिए निमंत्रण भेजा था।

बाबर को भारत बुलाने के कारण :

बाबर को भारत पर आक्रमण के लिए आमंत्रित करने के पीछे सम्भवतः कुछ कारण इस प्रकार थे-
दौलत ख़ाँ पंजाब में अपना स्वतन्त्र अस्तित्व बनाये रखना चाहता था।
आलम ख़ाँ किसी भी तरह से दिल्ली के सिंहासन पर अपना अधिकार करना चाहता था।
राणा सांगा सम्भवतः बाबर के द्वारा अफ़ग़ानों की शक्ति को नष्ट करवा कर स्वयं दिल्ली के सिंहासन को प्राप्त करना चाहता था।
अपने चौथे अभियान 1524 ई. में बाबर ने लाहौर एवं दीपालपुर पर अधिकार कर लिया।
नवम्बर 1526 ई. में बाबर द्वारा किये गये पाँचवें अभियान में, जिसमें बदख्शाँ की सैनिक टुकड़ी के साथ बाबर का पुत्र हुमायूं भी आ गया था, उसने सर्वप्रथम दौलत ख़ाँ को समर्पण के लिए विवश किया और बाद में उसे बन्दी बना लिया गया। शीघ्र ही आलम ख़ाँ ने भी आत्मसमर्पण कर दिया। इस तरह पूरा पंजाब बाबर के क़ब्ज़े में आ गया।

पानीपत का प्रथम युद्ध (21 अप्रैल, 1526 ई) :

इस समय इब्राहीम लोदी दिल्ली का सुल्तान था और दौलत ख़ाँ लोदी पंजाब का राज्यपाल। दौलत ख़ाँ लोदी, इब्राहीम लोदी से नाराज़ था। उसने दिल्ली सल्तनत से विद्रोह कर बाबर को अपनी मदद के लिए क़ाबुल से बुलाया। बाबर ख़ुद भी भारत पर हमला करना चाह रहा था। वह दौलत ख़ाँ लोदी के नियन्त्रण पर भारत पर आक्रमण करने की तैयारी करने लगा। उस समय तुर्क-अफ़ग़ान भारत पर आक्रमण लूट से मालामाल होने के लिए करते रहते थे। बाबर एक बहुत बड़ी सेना लेकर पंजाब की ओर चल दिया।
यह युद्ध सम्भवतः: बाबर की महत्वाकांक्षी योजनाओं की अभिव्यक्ति थी। यह युद्ध दिल्ली के सुल्तान इब्राहीम लोदी (अफ़ग़ान) एवं बाबर के मध्य लड़ा गया। 12 अप्रैल, 1526 ई. को दोनों ओर की सेनाएँ पानीपत के मैदान में आमने-सामने आ गईं और युद्ध का आरम्भ 21 अप्रैल को हुआ। ऐसा माना जाता है कि इस युद्ध का निर्णय दोपहर तक ही हो गया। युद्ध में इब्राहीम लोदी बुरी तरह से परास्त हुआ और मार दिया गया।
बाबर ने अपनी कृति “बाबरनामा” में इस युद्ध को जीतने में मात्र 12000 सैनिकों के उपयोग किए जाने का उल्लेख किया है। किन्तु इस विषय पर इतिहासकारों में बहुत मतभेद है।
इस युद्ध में बाबर ने पहली बार प्रिसद्ध “तुलगमा युद्ध नीति” का प्रयोग किया।
इसी युद्ध में बाबर ने तोपों को सजाने में “उस्मानी विधि” (रूमी विधि) का प्रयोग किया था।
बाबर ने तुलगमा युद्ध पद्धति उजबेकों से ग्रहण की थी। पानीपत के ही युद्ध में बाबर ने अपने प्रिसद्ध निशानेबाज “उस्ताद अली” और “मुस्तफा” की सेवाएँ लीं। इस युद्ध में लूटे गए धन को बाबर ने अपने सैनिक अधिकारियों, नौकरों एवं सगे सम्बन्धियों में बाँट दिया। सम्भवत: इस बँटवारे में हुमायूं को कोहिनूर हीरा प्राप्त हुआ।
इस हीरे की क़ीमत के बारे में यह माना जाता है कि इसके मूल्य द्वारा पूरे संसार का आधे दिन का ख़र्च पूरा किया जा सकता था। भारत विजय के ही उपलक्ष्य में बाबर ने प्रत्येक क़ाबुल निवासी को एक-एक चाँदी का सिक्का उपहार स्वरूप प्रदान किया था। अपनी इसी उदारता के कारण उसे “कलन्दर” की उपाधी दी गई थी। पानीपत विजय के बाद बाबर ने कहा, “काबुल की गरीबी अब फिर हमारे लिए नहीं”। पानीपत के युद्ध ने भारत के भाग्य का तो नहीं, किन्तु लोदी वंश के भाग्य का निर्णय अवश्य कर दिया। अफ़ग़ानों की शक्ति समाप्त नहीं हुई, लेकिन दुर्बल अवश्य हो गई। युद्ध के पश्चात् दिल्ली तथा आगरा पर ही नहीं, बल्कि धीरे-धीरे लोदी साम्राज्य के समस्त भागों पर भी बाबर ने अधिकार कर लिया।

चग़ताई तुर्क

मुगल शासक वास्तव में तुर्कों की चग़ताई नामक शाखा के थे। इस शाखा का नाम प्रिसद्ध मंगोल नेता चंगेज खां के द्वितीय पुत्र के नाम पर पड़ा था, जिसके अधिकार में मध्य एशियाई तथा तुर्कों का देश तुर्किस्तान थे।
बाबर (जो भारतीय मुगल वंश का संस्थापक था) की माँ, चग़ताई वंश की राजकन्या थी। इसी कारण मुगल स्वयं को चग़ताई वंश से संबंधित बतलाते हैं।

सर-ए-पुल के युद्ध

शैबानी खां ने 1501 ई. में सर-ए-पुल के युद्ध में बाबर को पराजित कर मध्य एशियाई से खदेड़ दिया। इस युद्ध में उजबेगों की युद्ध नीति ‘तुलगमा’ पद्धति का प्रयोग शैबानी खां ने बाबर के विरुद्ध किया था।
इस युद्ध नीति में अपने विश्वस्त सिपाहियों के साथ रणभूमि में बीच में मौजूद राजा या बादशाह सेना को चार टुकड़ों में बांट देता था।
पहली दो टुकड़ी आगे की ओर बादशाह के दाहिने और बाएं छोर की ओर व अन्य दो टुकड़ी पीछे की ओर इसी तरह तैनात रहती थीं। सबसे आगे पंक्ति में ढेर सारी बैलगाड़ियां रखी जाती थीं और उनको चमड़े के रस्सों से आपस में बांध दिया जाता था। उसके बीच इतनी जगह छोड़ी जाती थी कि दो घुड़सवार सैनिक एक साथ निकल सकें। बैलगाड़ियों की मजबूत रक्षा पंक्ति के पीछे तोपखाना और धनुष, बाण के माहिर निशानेबाज तैनात होते थे। इसकी खास बात यह थी कि इसमें एक बार में एक ही टुकड़ी बाहर निकलती और जोरदार हमला बोलकर वापस रक्षा पंक्ति में चली जाती थी। वहीं इस टुकड़ी के हमले से पहले दुश्मनों पर बाण और तोप के गोलों की बरसात की जाती थी, ताकि दुश्मन को संभलने का मौका ही न मिल सके और इस तरह दुश्मन चाहकर भी इस मजबूत घेरेबंदी को तोड़ नहीं पाता था।

खानवा का युद्ध :

“खानवा” नामक स्थान राजस्थान में भरतपुर के निकट एक ग्राम है, जो फतेहपुर सीकरी से 10 मील (लगभग 16 कि.मी.) उत्तर-पश्चिम में स्थित है। उत्तरी भारत में दिल्ली के सुल्तान के बाद सबसे अधिक शक्तिशाली शासक चित्तौड़ का राजपूत नरेश राणा साँगा (संग्राम सिंह) था। उसने दो मुस्लिमों- इब्राहीम लोदी और बाबर के युद्ध में तटस्थता की नीति अपनायी। साँगा का विचार था कि बाबर लूट-मार करके वापस चला जायेगा, तब लोदी शासन को हटा दिल्ली में हिन्दू राज्य का उसे सुयोग प्राप्त हो जायेगा।
किंतु जब साँगा ने देखा कि बाबर अब भारत में मुग़ल साम्राज्य की स्थापना का आयोजन कर रहा है, तब वह उससे युद्ध करने के लिए तैयार हुआ। राणा साँगा वीर और कुशल सेनानी था। वह अनेक युद्ध कर चुका था। अधिकांश युद्धों में उसे विजय प्राप्त हुई थी। उधर बाबर ने भी समझ लिया था कि राणा साँगा के रहते हुए भारत में मुग़ल राज्य की स्थापना करना सम्भव नहीं हैं। अतः उसने भी अपनी सेना के साथ राणा से युद्ध करने का निश्चय किया। युद्ध के सम्भावित कारण 17 मार्च, 1527 ई. में ‘खानवा का युद्ध’ बाबर और राणा साँगा के बीच लड़ा गया।
इस युद्ध के कारणों के विषय में इतिहासकारों के अनेक मत हैं- चूंकि पानीपत के युद्ध के पूर्व बाबर एवं राणा साँगा में हुए समझौते के तहत इब्राहिम लोदी के ख़िलाफ़ साँगा को बाबर के सैन्य अभियान में सहायता करनी थी, जिससे राणा साँगा बाद में मुकर गया था। राणा साँगा बाबर को दिल्ली का बादशाह नहीं मानता था।
यह युद्ध बाबर एवं राणा सांगा की महत्वाकांक्षी योजनाओं का परिणाम था। बाबर सम्पूर्ण भारत को हासिल करना चाहता था तथा राणा सांगा तुर्क-अफ़ग़ान राज्य के खण्डहरों के अवशेष पर एक हिन्दू राज्य की स्थापना करना चाहता था, परिणामस्वरूप दोनों सेनाओं के मध्य 17 मार्च, 1527 ई. को युद्ध आरम्भ हुआ। इस युद्ध में राणा सांगा का साथ मारवाड़, अम्बर, ग्वालियर, अजमेर, हसन ख़ाँमेवाती, बसीन चंदेरी एवं इब्राहिम लोदी का भाई महमूद लोदी दे रहे थे।
इस युद्ध में राणा सांगा के संयुक्त मोर्चे की ख़बर से बाबर के सैनिकों का मनोबल गिरने लगा। बाबर ने अपने सैनिकों के उत्साह को बढ़ाने के िलए शराब पीने और बेचने पर प्रतिबद्ध की घोषणा कर शराब के सभी पात्रों को तुड़वा कर शराब न पीने की कसम ली, उसने मुसलमानों से “तमगा कर” न लेने की घोषणा की।
तमगा एक प्रकार का व्यापारिक कर था, जिसे राज्य द्वारा लगाया जाता था। इस तरह खानवा के युद्ध में भी पानीपत युद्ध की रणनीति का उपयोग करते हुए बाबर ने राणा सांगा के विरुद्ध एक सफल युद्ध की रणनीति तय की।

चंदेरी का युद्ध :

चंदेरी का युद्ध 1528 ई. में मुग़लों तथा राजपूतों के मध्य लड़ा गया था। खानवा युद्ध के पश्चात् राजपूतों की शक्ति पूरी तरह नष्ट नहीं हुई थी, इसलिए बाबर ने चंदेरी का युद्ध शेष राजपूतों के खिलाफ लड़ा। इस युद्ध में राजपूतों की सेना का नेतृत्व मेदिनी राय ने किया।
इस युद्ध में मेदिनी राय की पराजय हुई। युद्ध के पश्चात् मेदिनी राय ने बाबर की अधीनता स्वीकार कर ली और महिलाओं ने जौहर को स्वीकार करके सामूहिक आत्मदाह कर लिया।
कहा जाता है कि खानवा युद्ध में राजपूतों को हराने के बाद बाबर कि नजर अब चंदेरी पर थी। उसने चंदेरी के तत्कालीन राजपूत राजा से वहाँ का महत्वपूर्ण क़िला माँगा और बदले में अपने जीते हुए कई क़िलों में से कोई भी क़िला राजा को देने की पेशकश की। परन्तु राजा चंदेरी का क़िला देने के लिए राजी ना हुआ। तब बाबर ने क़िला युद्ध से जीतने की चेतावनी दी। चंदेरी का क़िला आसपास की पहाड़ियों से घिरा हुआ था। यह क़िला बाबर के लिए काफ़ी महत्व का था।
मुग़लों द्वारा पहाड़ी को काटना :
बाबर की सेना में हाथी, तोपें और भारी हथियार थे, जिन्हें लेकर उन पहाड़ियों के पार जाना दुष्कर था और पहाड़ियों से नीचे उतरते ही चंदेरी के राजा की फौज का सामना हो जाता, इसलिए राजा आश्वस्त व निश्चिन्त था। कहा जाता है की बाबर अपने निश्चय पर दृढ़ था और उसने एक ही रात में अपनी सेना से पहाड़ी को काट डालने का अविश्वसनीय कार्य कर डाला।
उसकी सेना ने एक ही रात में एक पहाड़ी को ऊपर से नीचे तक काटकर एक ऐसी दरार बना डाली, जिससे होकर उसकी पूरी सेना और साजो-सामान ठीक क़िले के सामने पहुँच गये।

घाघरा का युद्ध :

घाघरा का युद्ध ‘भारतीय इतिहास’ में लड़े गये प्रिसद्ध युद्धों में से एक था। यह युद्ध 6 मई, 1529 ई. को मुग़ल बादशाह बाबर और अफ़ग़ानों के मध्य लड़ा गया था। युद्ध में बाबर ने महमूद लोदी के नेतृत्व में लड़ रहे अफ़ग़ानों को करारी शिकस्त दी। बाबर ने ‘घाघरा के युद्ध’ में बंगाल एवं बिहार की संयुक्त सेनाओं को परास्त किया। घाघरा युद्ध की यह विशेषता थी कि यह जल एवं थल दोनों पर लड़ा गया था। युद्ध के परिणामस्वरूप बाबर का साम्राज्य ऑक्सस से घाघरा एवं हिमालय से ग्वालियर तक पहुँच गया। घाघरा युद्ध के बाद बाबर ने बंगाल के शासक नुसरतशाह से संधि कर उसके साम्राज्य की संप्रभुता को स्वीकार किया। नुसरतशाह ने बाबर को आश्वासन दिया कि वह बाबर के शत्रुओं को अपने साम्राज्य में शरण नहीं देगा। इस युद्ध के लगभग डेढ़ वर्ष बाद ही बीमारी के कारण 26 दिसम्बर, 1530 को बाबर की मृत्यु हो गई।

मुग़ल साम्राज्य की स्थापना :

इब्राहीम लोदी और राणा साँगा की हार के बाद बाबर ने भारत में मुग़ल राज्य की स्थापना की और आगरा को अपनी राजधानी बनाया। उससे पहले सुल्तानों की राजधानी दिल्ली थी; किंतु बाबर ने उसे राजधानी नहीं बनाया, क्योंकि वहाँ पठान थे, जो तुर्कों की शासन−सत्ता पसंद नहीं करते थे। प्रशासन और रक्षा दोनों नजरियों से बाबर को दिल्ली के मुक़ाबले आगरा सही लगा। मुग़ल राज्य की राजधानी आगरा होने से शुरू से ही ब्रज से घनिष्ठ संबंध रहा।
बाबर ने अपना पद ‘बादशाह’ घोषित किया था। बाबर के बाद सभी मुग़ल सम्राट ‘बादशाह’ कहलाये।

मृत्यु :

इतिहासकारों के मुताबिक बाबर ने अपने बेटे हुमायूं को अपनी जागीर संभालने भेजा था। वहां वह बेहद बीमार पड़ गया। उसे गंभीर हालत में नाव से आगरा लाया गया। आगरा किले में उसकी हालत ज्‍यादा ही खराब हो गई। उसका इलाज कर रहे हकीमों ने हाथ खड़े कर दिए। उस वक्त हुमायूं की बीमारी की कारगर दवा हकीमों को समझ में नहीं आ रही थी।
इतिहासकार राजकिशोर राजे ने अपनी पुस्तक ‘तवारीख ए आगरा’ में लिखा है, ‘तब उस वक्त के एक मशहूर फकीर अबूबका ने बाबर से अपनी सबसे कीमती वस्‍तु दान करते हुए खुदा से हुमायूं की जिंदगी के लिए प्रार्थना करने को कहा। बाबर ने स्वयं को सबसे कीमती बताया और हुमायूं के पलंग की परिक्रमा करते हुए कहा कि हुमायूं की बीमारी उस पर आ जाए।
कहा जाता है कि इसके बाद बाबर बीमार हो गया। उसकी हालत बिगड़ने लगी। दूसरी ओर हुमायूं स्‍वस्‍थ होने लगा। जब हुमायूं पूरी तरह ठीक हो गया, तब 26 दिसम्‍बर 1530 को आगरा में बाबर की मृत्यु हो गई।
उसके शव को अस्‍थाई रूप से जमुना पार चार बाग में रखा गया और बाद में उसकी इच्‍छानुसार काबुल ले जाकर अंतिम रूप से दफना दिया गया। बाबर की मृत्‍यु के चार दिन बाद 30 दिसम्‍बर 1530 को हुमायूं आगरा के सिंहासन पर बैठा ।

बाबर की उपलब्धियाँ :

सम्भवतः बाबर कुषाणों के बाद ऐसा पहला शासक था, जिसने काबुल एवं कंधार को अपने पूर्ण नियंत्रण में रखा। उसने भारत में अफ़ग़ान एवं राजपूत शक्ति को समाप्त कर “मुग़ल साम्राज्य” की स्थापना की, जो लगभग पौने दो सौ वर्षों तक जीवित रहा। बाबर ने भारत पर आक्रमण कर एक नई युद्ध नीति का प्रचलन किया। बाबर ने सड़कों की माप के िलए ‘गज़-ए-बाबरी’ का प्रयोग का शुभारम्भ किया।

विद्वान व्यक्ति :

बाबर योग्य शासक होने के साथ ही तुर्की भाषा का विद्वान् भी था। उसने तुर्की भाषा में अपनी आत्मकथा “बाबरनामा” की रचना की, जिसका फ़ारसी भाषा में अनुवाद बाद में अब्दुल रहीम ख़ानख़ाना ने किया। लीडेन एवं अर्सकिन ने 1826 ई. में ‘बाबरनामा’ का अंग्रेज़ी भाषा में अनुवाद किया।
इसके अतिरिक्त बाबर को “मुबइयान” नामक पद्य शैली का जन्मदाता भी माना जाता है।
इसके अतिरिक्त बाबर ने ‘खत-ए-बाबरी’ नामक एक लिपि का भी अविष्कार किया। बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘बाबरनामा’ में केवल पाँच मुस्लिम शासकों- बंगाल, दिल्ली, मालवा, गुजरात एवं बहमनी राज्यों तथा दो हिन्दू शासकों मेवाड़ एवं विजयनगर का उल्लेख किया है।
जहीरुद्दीन मोहम्मद बाबर के जीवन से धैर्य व संकल्प से सफलता की शिक्षा मिलती है। बाल्यावस्था में ही पिता का साया छिन जाने के बावजूद बाबर ने कभी हिम्मत नहीं हारी।
उसके साहस एवं धैर्य का ही प्रतिफल था, कि उसने भारत में मुगल साम्राज्य की नींव डाली। उसने अपने पुत्र हुमायूं को सलाह दी थी कि “संसार उसका है जो परिश्रम करता है। किसी भी आपत्ति का मुकाबला करने से मत चूकना। परिश्रम हीनता और आराम बादशाह के लिए हानिकारक है।“
ऐसी मान्यता है कि मुगल बादशाह बाबर के सेनानायक मीर बाकी ने अयोध्या में बाबरी मस्जिद का निर्माण कराया था।
by - lbsnaa jeet 

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