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जहांगीर और नूरजहां

 दो अस्पा एवं  सिह-अस्पा प्रथा 

दो अस्पा एवं सिह-अस्पा प्रथा जहांगीर ने चलाई थी। इसके अंतर्गत बिना जात पद बढ़ाए ही मनसबदारों को अधिक सेना रखनी पड़ती थी। मुगल साम्राज्य में मंसब से तात्पर्य उस पदस्थिति से था जो बादशाह अपने पदाधिकारियों को प्रदान करता था। मंसब दो प्रकार के होते थे, ‘जात’ और ‘सवार’।
मंसब की प्रथा का आरंभ सर्वप्रथम अकबर ने सन् 1575 में किया। ‘जात’ से तात्पर्य मंसबदार की उस स्थिति से था जो उसे प्रशासकीय पद श्रेणी में प्राप्त थी।
उसका वेतन भी उसी अनुपात में उन वेतन सूचियों के आधार पर जो कि उस समय लागू थीं; निर्धारित होता था। सवार श्रेणी से अभिप्राय था कि कितना सैनिक दल एक मंसबदार को बनाए रखना है; और इसके लिये उसे कितना वेतन मिलेगा। इसका निर्धारण प्रचलित वेतन क्रम को सवारों की संख्या से गुणा करके होता था।

अकबर के समय में सवार श्रेणी प्रायः या तो जात श्रेणी के बराबर अथवा कम ही होती थी।

जहाँगीर ने मनसबदारी पद्धति में एक महत्वपूर्ण प्रयोग किया अर्थात् दो अश्व और तीन अश्व श्रेणी का प्रारंभ। दो अश्व व तीन अश्व श्रेणी को सवार श्रेणी का ही भाग माना जाता था। दो अश्व तीन अश्व श्रेणी प्राप्त करने वाले का वेतन तथा सैनिक जिम्मेदारियाँ दोनों ही दोहरे हो जाते थे।

जात’ श्रेणी पर वेतन प्रत्येक श्रेणी के लिये अलग-अलग निर्धारित था। वेतन में वृद्धि श्रेणी में वृद्धि होने के समानुपात में नहीं होती थी।

चित्तौड़ की संधि

1615 ई. में राणा अमर सिंह तथा मुगल बादशाह जहांगीर के मध्य चित्तौड़गढ़ की संधि हुई। इसमें राणा ने मुगल बादशाह की अधीनता स्वीकार कर ली तथा बादशाह जहांगीर ने राणा को चित्तौड़ (दुर्ग की किलाबंदी न करने की शर्त के साथ) समेत समस्त भू-भाग वापस कर दिया, जो अकबर के समय से मुगल आधिपत्य में था।

ईस्ट इंडिया कंपनी ने जहांगीर के दरबार में पहले किसे भेजा था- हॉकिंस

विलयम हॉकिंस ईस्ट इंडिया कम्पनी का एक कर्मचारी तथा व्यापारी था। वह फ़ारसी भाषा का बहुत अच्छा जानकार था। हॉकिंस, ‘हेक्टर’ नामक जहाज़ पर सवार होकर पूर्व की ओर ईस्ट इण्डिया कम्पनी की तीसरी यात्रा का संचालक था। 

बादशाह जहाँगीर के नाम इंग्लैण्ड के राजा ‘जेम्स प्रथम’ का पत्र लेकर वह 1608 ई. में भारत के सूरत में पहुँचा। हॉकिन्स स्थल मार्ग से मुग़ल दरबार में गया और जहाँगीर से भेंट की।
वह मुग़ल दरबार में 1613 ई. तक रहा। जहाँगीर उससे अक्सर मिला करता था और उसने हॉकिन्स को 400 सवारों का मनसबदार बना दिया था। हॉकिन्स को जहाँगीर ने ‘ख़ान’ की उपाधि देकर सम्मानित किया था। बादशाह के कहने से हॉकिंस ने एक ‘आरमेनियाई’ ईसाई लड़की से विवाह कर लिया। उसने अंग्रेज़ों को कुछ व्यापार सम्बन्धी सुविधाएँ देने के लिए बादशाह को अंग्रेज़ों के अनुकूल बना लिया।

पुर्तग़ालियों के विरोध के कारण हॉकिन्स की योजनाओं पर अमल नहीं हो सका। हॉकिन्स 1613 ई. में मुग़ल दरबार से चला गया और वापस इंग्लैण्ड पहुँच गया। उसने भारत की यात्रा का वर्णन अपनी पुस्तक में लिखा है। उसने बादशाह की सम्पत्ति तथा उसके दरबारी क़ानूनों का उल्लेख किया है।

जहांगीर के दरबार में ब्रिटिश शासक जेम्स प्रथम का राजदूत - सर टोमस रॉ 

सर थामस रो ब्रिटिश सम्राट जेम्स प्रथम द्वारा भेजा गया प्रथम राजदूत था जो जहांगीर के दरबार में आया था।

सर थॉमस रो (1615-1619) ब्रिटेन के राजा जेम्स प्रथम के दूत के रूप में 18 सितंबर, 1615 को सूरत पहुंचा। जनवरी, 1616 में वह अजमेर में जहांगीर के दरबार में उपस्थित हुआ। उसे बादशाह के साथ मांडू, अहमदाबाद तथा अजमेर जैसे अनेक स्थानों पर जाने का अवसर मिला। वह बादशाह के साथ शिकारी खेलने भी गया। वह आगरा में एक वर्ष तक रहा था।
इंग्लैण्ड के राजा से आज्ञा लेकर उसने कुछ लोगों को एकत्र कर ईस्ट इण्डिया कम्पनी की स्थापना की थी।
थॉमस रो ने अजमेर के क़िले में जहाँगीर से मुलाकात की थी।
उसने बादशाह के सामने खड़े होकर एक याचक के रूप में भारत में व्यापार करने की अनुमित माँगी थी।
थॉमस रो ने सम्राट जहाँगीर की अभिरुचियों तथा धार्मिक मान्यताओं के बारे में विस्तार से लिखा है।
उसने ख़ुसरो प्रकरण का भी उल्लेख किया है।
         जहाँगीर के पाँच पुत्र थे – ख़ुसरो, परवेज, ख़ुर्रम, शहरयार और जहाँदार। सबसे बड़ा पुत्र ख़ुसरो, जो ‘मानबाई’ से उत्पन्न हुआ था, रूपवान, गुणी और वीर था। अपने अनेक गुणों में वह अकबर के समान था, इसलिए बड़ा लोकप्रिय था। अकबर भी अपने उस पौत्र को बड़ा प्यार करता था। जहाँगीर के कुकृत्यों से जब अकबर बड़ा दुखी हो गया, तब अपने अंतिम काल में उसने ख़ुसरो को अपना उत्तराधिकारी बनाने का विचार किया था।
फिर बाद में सोच-विचार करने पर अकबर ने जहाँगीर को ही अपना उत्तराधिकारी घोषित कर दिया था। ख़ुसरो के मन में बादशाह बनने की लालसा पैदा हुई थी। अपने मामा मानिसंह एवं ससुर मिर्ज़ा अजीज कोका की शह पर अप्रैल, 1606 ई. में अपने पिता जहाँगीर के विरुद्ध उसने विद्रोह कर दिया। जहाँगीर ने ख़ुसरो को आगरा के क़िले में नज़रबंद रखा, परन्तु ख़ुसरो अकबर के मक़बरे की यात्रा के बहाने भाग निकला।
लगभग 12000 सैनिकों के साथ ख़ुसरो एवं जहाँगीर की सेना का मुक़ाबला जालंधर के निकट “भैरावल” के मैदान में हुआ। ख़ुसरों को पकड़ कर क़ैद में डाल दिया गया। सिक्खों के पाँचवें गुरु अर्जुनदेव को जहाँगीर ने फाँसी दिलवा दी, क्योंकि उन्होंने विद्रोह के समय ख़ुसरो की सहायता की थी।
*कालान्तर में ख़ुसरो द्वारा जहाँगीर की हत्या का षड्यन्त्र रचने के कारण, उसे अन्धा करवा दिया गया।
ख़ुर्रम (शाहजहाँ) ने अपने दक्षिण अभियान के समय ख़ुसरो को अपने साथ ले जाकर 1621 ई. में उसकी हत्या करवा दी।
एक डच पर्यटक, जिसने जहांगीर के शासनकाल का मूल्यवान विवरण दिया है, वह था – फ्रांसिस्को पेलसर्ट
इसने अपनी पुस्तक ‘रिमान्स्ट्रैटी’ में जहांगीर के समय का अद्भुत विवरण लिखा है

मुगल चित्रकला
मुगल चित्रकला जहांगीर के शासनकाल में अपनी पराकाष्ठा पर पहुंच गई। पहले चित्रकारी हस्तलिखित ग्रंथ की विषय-वस्तु से संबद्ध होती थी। जहांगीर ने उसे इस बंधन से मुक्त कर दिया। फारुख बेग, दौलत, मनोहर, मंसूर, अबुल हसन आदि उसके काल के ऐसे चित्रकार हैं, जिन्होंने अपनी कलात्मक प्रतिभा की बदौलत मुगल चित्रकला के इतिहास में अपना नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित करवा लिया।
जहांगीर के समय के सर्वोत्कृष्ट चित्रकार उस्ताद मंसूर और अबुल हसन थे। सम्राट
जहांगीर ने उन दोनों को क्रमशः नादिर-उल-अस्र (समय का सर्वश्रेष्ठ) (उस्ताद मंसूर) तथा नादिर-उज़-ज़मां (“उम्र का आश्चर्य”) (अबुल हसन) की उपाधि प्रदान की थी।
उस्ताद मंसूर प्रसिद्ध पक्षी विशेषज्ञ चित्रकार था, जबकि अबुल हसन को व्यक्ति चित्र में महारत हासिल थी।

मुगल शासक बाबर एवं जहांगीर के मकबरे क्रमशः काबुल एवं शाहदरा (लाहौर) में स्थित हैं। ये क्रमशः अफगानिस्तान एवं पाकिस्तान में स्थित हैं। 


आत्मकथा (Autobiography) फारसी में लिखी
जहांगीर एक उच्चकोटि का लेखक तथा समालोचक था। उसने अपनी आत्मकथा फारसी भाषा में लिखी और उसका नाम ‘तुजुक-ए-जहांगीरी’ रखा। जहांगीर ने अपनी आत्मकथा में अपने गुणों के साथ अपने व्यक्तिगत दोषों को भी लिपिबद्ध किया है। इस ग्रंथ को तीन भागों में विभाजित किया गया है।
प्रथम भाग ग्रंथ की प्रस्तावना है, जो जहांगीर की मृत्यु के बाद मोहम्मद हादी द्वारा लिखी गई थी। इसके अंतर्गत बादशाह के आरंभिक जीवन का उल्लेख किया गया है। दूसरा भाग ग्रंथ का मूल भाग है जिसकी रचना जहांगीर ने स्वयं की थी। ग्रंथ के तीसरे भाग की रचना भी मोहम्मद हादी ने की थी।
बाबर ने अपनी आत्मकथा ‘तुजुक-ए-बाबरी’ तुर्की में लिखी थी।
अबुल फज़ल के हत्यारे को पुरस्कृत किया था
3 नवंबर, 1605 को आगरा के किले में जहांगीर का राज्याभिषेक हुआ और उसने ‘नरुद्दीन मुहम्मद जहांगीर बादशाह गाजी की उपाधि धारण की। जहांगीर ने अपने पक्ष के सरदारों को उच्च पद प्रदान किए जिनमें से एक अबुल फज़ल का हत्यारा राजा वीरसिंह बुंदेला भी था। अकबर की परंपरा को स्थापित रखते हुए जहांगीर ने अपना शासन उदारता से आरंभ किया और गद्दी पर बैठते ही उसने विभिन्न लोक हितकारी आदेश दिए।

जहांगीर के विरुद्ध विद्रोह
जहांगीर के सबसे बड़े पुत्र खुसरो ने जहांगीर के गद्दी पर बैठने के शीघ्र बाद विद्रोह किया था, जो कि 1606 ई. में पराजित हुआ। 1623 ई. में शहजादे खुर्रम के विद्रोह का महाबत खां के नेतृत्व वाली मुगल सेना ने दमन किया था। 1626 ई. में महाबत खां ने जहांगीर के विरुद्ध विद्रोह किया।
एत्मादूद्दौला का मकबरा
एत्मादूद्दौला का मकबरा नूरजहां ने 1622-28 ई. के मध्य में अपने पिता मिर्ज़ा गियास बेग की याद में बनवाया था। यह आगरा में यमुना नदी के तट पर स्थित एक अत्यंत आलंकारिक इमारत है। मुख्य मकबरा श्वेत संगमरमर का है।
सम्राज्ञी नूरजहां ने अपने पिता की स्मृति में आगरा में यमुना के किनारे एत्मादूद्दौला का मकबरा बनवाया था। यह उसके पिता गियास-उद-दीन बेग, जो जहांगीर के दरबार में मंत्री भी थे, की याद में बनवाया गया था।
मुगल काल के अन्य मकबरों से अपेक्षाकृत छोटा होने से, इसे कई बार श्रंगारदान भी कहा जाता है। यहां के बाग, पीट्रा ड्यूरा पच्चीकारी, व कई घटक ताजमहल से मिलते हुए हैं। इसमें सर्वप्रथम पित्रदुआ तकनीकी (पत्थर पर जवाहरात जङने का काम) का उपयोग हुआ।
इतिमद-उद-दौला उनकी उपाधि थी।
बेबी ताज के नाम से मशहूर इस मकबरे की कई चीजें ऐसी हैं जिन्हें बाद में ताजमहल बनाते समय अपनाया गया था। लोगों का कहना है कि कई जगह यहां की नक्‍काशी ताजमहल से भी ज्यादा खूबसूरत लगती है। इस मकबरे एक अन्य आकर्षण मध्‍य एशियाई शैली में बना इसका गुंबद है। यहां के बगीचे और रास्‍ते इसकी सुंदरता को और भी बढ़ाते हैं।
यह मकबरा भारत में बना पहला मकबरा है जो पूरी तरह सफेद संगमरमर से बनाया गया था। इसकी दीवारों पर पेड़ पौधों, जानवरों और पक्षियों के चित्र उकेरे गए हैं। कहीं कहीं आदमियों के चित्रों को भी देखा जा सकता है जो एक अनोखी चीज है क्‍योंकि इस्‍लाम में मनुष्‍य का सजावट की चीज के रूप में इस्‍तेमाल करने की मनाही है। अपनी खूबसूरती के कारण यह मकबरा आभूषण बक्से के रूप में जाना जाता है।
गोविंद महल, जो हिंदू वास्तुकला का अप्रतिम उदाहरण है,
गोविंद महल (Govind Palace) मध्य प्रदेश के दतिया में स्थित 7 मंजिला महल है।
इसका निर्माण 1614 ई. में राजा वीरसिंह देव (Raja Bir Singh Deo) द्वारा पत्थरों से करवाया गया था। यह बुंदेल काल के उत्तम वास्तुशिल्प का उदाहरण है। गोविंद महल में दीवारों पर की गई पेंटिंग एवं अन्य वास्तुशिल्प पर्यटकों को आकर्षित करते हैं।
'नूरजहां गुट
जहांगीर से विवाह के बाद नूरजहां ने 'नूरजहां गुट' (जुन्तादल) का निर्माण किया। इस गुट के प्रमुख सदस्य थे - एत्मादूद्दौला या मिर्ज़ा गियास बेग (नूरजहां का पिता), अस्मत बेगम (नूरजहां की मां), आसफ खां (नूरजहां का भाई) एवं शहजादा खुर्रम (बाद में शाहजहां)।
नूरजहां
सत्रह वर्ष की अवस्था में मेहरुन्निसा का विवाह ‘अलीकुली’ नामक एक साहसी ईरानी नवयुवक से हुआ था, जिसे जहाँगीर के राज्य काल के प्रारम्भ में शेर अफगान की उपाधि और बर्दवान की जागीर दी गई थी। 1607 ई. में जहाँगीर के दूतों ने शेर अफ़ग़ान को एक युद्ध में मार डाला। मेहरुन्निसा को पकड़ कर दिल्ली लाया गया और उसे बादशाह के शाही हरम में भेज दिया गया।
यहाँ वह बादशाह अकबर की विधवा रानी ‘रुकईयाबेगम’ की परिचारिका बनी। मेहरुन्निसा को जहाँगीर ने सर्वप्रथम नौरोज़ त्यौहार के अवसर पर देखा और उसके सौन्दर्य पर मुग्ध होकर जहाँगीर ने मई, 1611 ई. में उससे विवाह कर लिया। विवाह के पश्चात् जहाँगीर ने उसे “नूरमहल” एवं “नूरजहाँ” की उपाधि प्रदान की। 1613 ई. में नूरजहाँ को “पट्टमहिषी” या “बादशाह बेगम” बनाया गया।
असाधारण सुन्दरी होने के अतिरिक्त नूरजहाँ बुद्धिमती, शील और विवेकसम्पन्न भी थी। उसकी साहित्य, कविता और ललित कलाओं में विशेष रुचि थी। उसका लक्ष्य भेद अचूक होता था। 1619 ई. में उसने एक ही गोली से शेर को मार गिराया था। इन समस्त गुणों के कारण उसने अपने पति पर पूर्ण प्रभुत्व स्थापित कर लिया था। इसके फलस्वरूप जहाँगीर के शासन का समस्त भार उसी पर आ पड़ा था। सिक्कों पर भी उसका नाम खोदा जाने लगा और वह महल में ही दरबार करने लगी।
उसके पिता एत्मादद्दोला और भाई आसफ ख़ाँ को मुग़ल दरबार में उच्च पद प्रदान किया गया था और उसकी भतीजी का विवाह, जो आगे चलकर मुमताज़ के नाम से प्रसिद्ध हुई, शाहजहाँ से हो गया। उसने पहले पति से उत्पन्न अपनी पुत्री का विवाह जहाँगीर के सबसे छोटे पुत्र शहरयार से कर दिया और क्योंकि उसकी जहाँगीर से कोई संतान नहीं थी, अत: वह शहरयार को ही जहाँगीर के उपरांत राज सिंहासन पर बैठाना चाहती थी। नूरजहाँ के ये सभी कार्य उसकी कूटनीति का ही एक हिस्सा थे।
1620 ई. के अन्त तक नूरजहाँ के सम्बन्ध ख़ुर्रम (शाहजहाँ) से अच्छे नहीं रहे, क्योंकि नूरजहाँ को अब तक यह अहसास हो गया था कि शाहजहाँ के बादशाह बनने पर उसका प्रभाव शासन के कार्यों पर कम हो जाएगा। इसलिए नूरजहाँ ने जहाँगीर के दूसरे पत्रु “शहरयार” को महत्व देना प्रारम्भ कर किया। चूंकि शहरयार अल्पायु एवं दुर्बल चरित्र का था, इसलिए उसके सम्राट बनने पर नूरजहाँका प्रभाव पहले की तरह शासन के कार्यों में बना रहता। इस कारण से शेर अफ़ग़ान से उत्पन्न अपनी पुत्री ‘लाडली बेगम’ की शादी 1620 ई. में शहरयार से कर उसे 8000/4000 का मनसब प्रदान किया।
शाहजहाँ को जब इस बात का अहसास हुआ कि नूरजहाँ उसके प्रभाव को कम करना चाह रही है, तो उसने जहाँगीर द्वारा कंधार दुर्ग पर आक्रमण कर उसे जीतने के आदेश की अवहेलना करते हुए 1623 ई. में ख़ुसरो ख़ाँ का वध कर दक्कन में विद्रोह कर दिया।
उसके विद्रोह को दबाने के लिए नूरजहाँ ने आसफ ख़ाँ को न भेज कर महावत ख़ाँ को शहजादा परवेज़ के नेतृत्व में भेजा। उन दोनों ने सफलतापूर्वक शाहजहाँ के विद्रोह को कुचल दिया। शाहजहाँ ने पिता जहाँगीर के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया और उसे क्षमा मिल गई। जमानत के रूप में शाहजहाँ के दो पुत्रों दारा शिकोह और औरंगज़ेब को बंधक के रूप में राजदरबार में रखा गया। 1625 ई. तक शाहजहाँ का विद्रोह पूर्णतः शान्त हो गया।
शाहजहाँ के विद्रोह को दबाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह करने वाले महावत ख़ाँ से नूरजहाँ को ईर्ष्या होने लगी। नूरजहाँ को इसका अहसास था, कि महावत ख़ाँ उन लोगों में से है, जिन्हें शासन के कार्यों में मेरा प्रभुत्व स्वीकार नहीं है। महावत ख़ाँ एवं शाहज़ादा परवेज की निकटता से भी नूरजहाँ को ख़तरा था। अतः उसके प्रभाव को कम करने के लिए नूरजहाँ ने उसे बंगाल जाने एवं युद्ध के समय लूटे गये धन का हिसाब देने को कहा। इन कारणों के अतिरिक्त कुछ और कारण भी थे, जिससे अपमानित महसूस कर महावत ख़ाँ ने विद्रोह कर काबुल जा रहे सम्राट जहाँगीर को झेलम नदी के तट पर 1626 ई. में क़ैद कर लिया। नूरजहाँ एवं उसके भाई आसफ़ ख़ाँ को भी बन्दी बना लिया। क़ैद में रखने पर भी महावत ख़ाँ ने जहाँगीर के प्रति निष्ठा एवं सम्मान की बात नहीं छोड़ी।
रोहतास में नूरजहाँ एवं जहाँगीर ने कूटनीति के द्वारा अपने को महावत ख़ाँ के प्रभाव से मुक्त कर लिया। महावत ख़ाँ अपनी सुरक्षा के लिए “थट्टा” की ओर भाग गया। 28 अक्टूबर, 1626 को परवेज की मृत्यु के बाद एक तरह से महावत ख़ाँ कमज़ोर हो गया और वह शाहजहाँ की सेवा में चला गया।
जहाँगीर के जीवन काल में नूरजहाँ सर्वशक्ति सम्पन्न रही, किंतु 1627 ई. में जहाँगीर की मृत्यु के उपरांत उसकी राजनीतिक प्रभुता नष्ट हो गई।
नूरजहाँ की मृत्यु 1645 ई. में हुई। अपनी मृत्यु पर्यन्त तक का शेष जीवन उसने लाहौर में बिताया। उसकी कलात्मक रुचि का प्रमाण उस भव्य एवं आकर्षक मक़बरे में उपलब्ध है, जिसे उसने अपने पिता एत्माद्दौला के अस्थि अवशेषों पर आगरा में बनवाया था। कलाविदों के अनुसार यह मक़बरा बारीक और साज-सज्जा की दृष्टि से अनुपम है।
महावत खां
महावत खां मुगल राज्य का एक मनसबदार और दरबारी था। महावत खां का प्रभाव तब बढ़ने लगा जब परवेज़ और महावत खां ने खुर्रम को पराजित किया था, इससे नूरजहाँ चिंतित हो गई और उसका प्रभाव समाप्त करने के लिए उसे बंगाल का सुबेदार बना कर बंगाल भेज दिया। इसके अलावा नूरजहाँ ने महावत को अपमानित करने के लिए उस पर कई आरोप लगाए और बंगाल व बिहार से मिले हाथियों का तथा प्रांत के आय व व्यय का हिसाब भी माँगा।
नूरजहाँ ने आरोप लगाया कि महावत खान ने सम्राट की आज्ञा के बिना ही अपनी पुत्री की शादी ख्वाजा उमर नक्शबंदी के पुत्र से कर दी है, इस पर उस युवक को अपमानित कर जेल में डाल दिया तथा वो सारा धन व वस्तुएं उस युवक से जब्त कर ली थी जो महावत खां ने उसे दी थी।
इस से महावत खान बहुत ही दुखी हुआ।
अंत मार्च 1625 ईस्वी महावत खान अपने चुने हुए 4-5 हज़ार राज पूत सैनिकों को लेकर जहाँगीर के शिविर के पास पहुंचा। उस समय जहांगीर कश्मीर से लौट कर काबुल जा रहा था। महावत ने जहाँगीर को सरलता से बन्दी बना लिया और नूरजहाँ को भी बन्दी बना लिया। नूरजहाँ ने अपनी सूझ बूझ से महावत खां के सैनिकों में फूट डाल कर जहाँगीर को तथा स्वयं को आज़ाद कराया।
महावत खान दक्षिण में भाग गया और खुर्रम के संरक्षण में रहने लगा।

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