अकबर
अकबर का जन्म राजपूत शासक राणा अमरसाल के महल अमरकोट, सिंध (वर्तमान पाकिस्तान) में 23 नवम्बर 1542 हुआ था। यहां बादशाह हुमायूं अपनी हाल की विवाहिता बेगम हमीदा बानो बेगम के साथ शरण लिये हुए थे। इस पुत्र का नाम हुमायूं ने एक बार स्वप्न में सुनाई दिये के अनुसार जलालुद्दीन मोहम्मद रखा।
हुमायूँ को पश्तून नेता शेरशाह सूरी के कारण फारस में अज्ञातवास बिताना पड़ रहा था।
किन्तु अकबर को वह अपने संग नहीं ले गया वरन रीवां (वर्तमान मध्य प्रदेश) के राज्य के एक ग्राम मुकुंदपुर में छोड़ दिया था।
कालांतर में अकबर सफ़ावी साम्राज्य (वर्तमान अफगानिस्तान का भाग) में अपने एक चाचा मिर्जा अस्करी के यहां रहने लगा। पहले वह कुछ दिनों कंधार में और फिर 1545 से काबुल में रहा।
1551 ई. में मात्र 9 वर्ष की अवस्था में पहली बार अकबर को ग़ज़नी की सूबेदारी सौंपी गई।
हुमायूं की मृत्यु के अवसर पर अकबर पंजाब में सिकंदर सूर को समाप्त करने में संलिप्त था। उस अवसर पर बैरम खां उसके संरक्षक के रूप में कार्य कर रहा था। हुमायूं की मृत्यु की सूचना मिलने पर पंजाब में गुरुदासपुर जिले के निकट कालानौर नामक स्थान पर 14 फरवरी, 1556 को अकबर को मुगल बादशाह घोषित किया गया। उस समय अकबर की आयु 14 वर्ष से कम थी।
अकबर का जन्म पूर्णिमा के दिन हुआ था इसलिए उनका नाम बदरुद्दीन मोहम्मद अकबर रखा गया था। बद्र का अर्थ होता है पूर्ण चंद्रमा और अकबर उनके नाना शेख अली अकबर जामी के नाम से लिया गया था।
किंवदंती है कि भारत की जनता ने उनके सफल एवं कुशल शासन के लिए अकबर नाम से सम्मानित किया था। अरबी भाषा में अकबर शब्द का अर्थ “महान” या बड़ा होता है।
शिक्षा :
अकबर आजीवन निरक्षर रहा। प्रथा के अनुसार चार वर्ष, चार महीने, चार दिन पर अकबर का अक्षरारम्भ हुआ और मुल्ला असामुद्दीन इब्राहीम को शिक्षक बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। कुछ दिनों के बाद जब पाठ सुनने की बारी आई, तो वहाँ कुछ भी नहीं था।
हुमायूँ ने सोचा, मुल्ला की बेपरवाही से लड़का पढ़ नहीं रहा है। लोगों ने भी जड़ दिया- “मुल्ला को कबूतरबाज़ी का बहुत शौक़ है। उसने शागिर्द को भी कबूतरों के मेले में लगा दिया है”। फिर मुल्ला बायजीद शिक्षक हुए, लेकिन कोई भी फल नहीं निकला।
दोनों पुराने मुल्लाओं के साथ मौलाना अब्दुल कादिर के नाम को भी शामिल करके चिट्ठी डाली गई। संयोग से मौलाना का नाम निकल आया। कुछ दिनों तक वह भी पढ़ाते रहे। काबुल में रहते अकबर को कबूतरबाज़ी और कुत्तों के साथ खेलने से फुर्सत नहीं थी।
हिन्दुस्तान में आया, तब भी वहीं रफ्तार बेढंगी रही। मुल्ला पीर मुहम्मद-बैरम ख़ाँ के वकील को यह काम सौंपा गया लेकिन सभी असफल सिद्ध हुए। पढ़ने-लिखने में अकबर की रुचि नहीं थी, उसकी रुचि कबूतर बाजी, घुड़सवारी और कुत्ते पालने में अधिक थी किन्तु ज्ञानोपार्जन में उसकी रुचि सदा से ही थी। कहा जाता है, कि जब वह सोने जाता था, एक व्यक्ति उसे कुछ पढ़ कर सुनाता रहता था।
पानीपत का द्वितीय युद्ध:
पानीपत का द्वितीय युद्ध 5 नवम्बर, 1556 ई. में लड़ा गया था। यह युद्ध दिल्ली के अफ़ग़ान शासक आदिलशाह सूर के वीर हिन्दू सेनानायक हेम चन्द्र विक्रमादित्य (हेमू) और अकबर की मुग़ल सेना के मध्य हुआ।
हेमू यह युद्ध मुग़ल सेनापति बैरम ख़ाँ की कूटनीतिक चाल से हार गया।
हेमू ने अपने स्वामी के लिए 24 लड़ाइयाँ लड़ी थीं, जिसमें उसे 22 में सफलता मिली थी।
हेमू आगरा और ग्वालियर पर अधिकार करता हुआ, 7 अक्तूबर, 1556 ई. को तुग़लकाबाद पहुँचा। यहाँ उसने मुगल तर्दी बेग को परास्त कर दिल्ली पर क़ब्ज़ा कर लिया।
हेमू ने राजा ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि के साथ एक स्वतन्त्र शासक बनने का सौभाग्य प्राप्त किया।
हेमू की इस सफलता से चिंतित अकबर और उसके कुछ सहयोगियों के मन में क़ाबुल वापस जाने की बात कौंधने लगी। परंतु बैरम ख़ाँ ने अकबर को इस विषम परिस्थिति का सामना करने के लिए तैयार कर लिया, जिसका परिणाम था- “पानीपत की द्वितीय लड़ाई”।
अकबर की विजय :
यह संघर्ष पानीपत के मैदान में 5 नवम्बर, 1556 ई. को हेमू के नेतृत्व में अफ़ग़ान सेना एवं बैरम ख़ाँ के नेतृत्व में मुग़ल सेना के मध्य लड़ा गया। दिल्ली और आगरा के हाथ से चले जाने पर दरबारियों ने बैरम ख़ाँ को सलाह दी कि हेमू इधर भी बढ़ सकता है। इसीलिए बेहतर है कि यहाँ से क़ाबुल चला जाए। लेकिन बैरम ख़ाँ ने इसे पसन्द नहीं किया। बाद में बैरम ख़ाँ और अकबर अपनी सेना लेकर पानीपत पहुँचे। हेमू की सेना संख्या और शक्ति, दोनों में बढ़-चढ़कर थी। पुर्तगालियों से मिली तोपों का उसे बड़ा अभिमान था।
5 नवम्बर को हेमू ने मुग़ल दल में भगदड़ मचा दी। युद्ध का प्रारम्भिक क्षण हेमू के पक्ष में जा रहा था, लेकिन इसी समय उसकी आँख में एक तीर लगा, वह सुध – बुध खो बैठा। नेता के बिना सेना में भगदड़ मच गई। हेमू को गिरफ्तार करके बैरम ख़ाँ ने मरवा दिया।
राज्य विस्तार :
दिल्ली पर पुनः अधिकार जमाने के बाद अकबर ने अपने राज्य का विस्तार करना शुरू किया और मालवा को 1562 में, गुजरात को 1572 में, बंगाल को 1574 में, काबुल को 1581 में, कश्मीर को 1586 में और खानदेश (महाराष्ट्र ) को 1601 में मुग़ल साम्राज्य के अधीन कर लिया। अकबर ने इन राज्यों में एक एक राज्यपाल नियुक्त किया।
अकबर यह नही चाहता था की मुग़ल साम्राज्य का केन्द्र दिल्ली जैसे दूरस्थ शहर में हो; इसलिए उसने यह निर्णय लिया की मुग़ल राजधानी को फतेहपुर सीकरी ले जाया जाए जो साम्राज्य के मध्य में थी।
एक पुराने बसे ग्राम सीकरी पर अकबर ने नया शहर बनवाया जिसे अपनी जीत यानी फतह की खुशी में फतेहाबाद या फतेहपुर नाम दिया गया। जल्दी ही इसे पूरे वर्तमान नाम फतेहपुर सीकरी से बुलाया जाने लगा। यहां के अधिकांश निर्माण उन 14 वर्षों के ही हैं, जिनमें अकबर ने यहां निवास किया। शहर में शाही उद्यान, आरामगाहें, सामंतों व दरबारियों के लिए आवास तथा बच्चों के लिए मदरसे बनवाये गए।
कुछ ही समय के बाद अकबर को राजधानी फतेहपुर सीकरी से हटानी पड़ी। कहा जाता है कि पानी की कमी इसका प्रमुख कारण था। फतेहपुर सीकरी के बाद अकबर ने एक चलित दरबार बनाया जो कि साम्राज्य भर में घूमता रहता था इस प्रकार साम्राज्य के सभी क्षेत्रों पर उचित ध्यान देना सम्भव हुआ।
सन 1585 में उत्तर पश्चिमी राज्य के सुचारू राज पालन के लिए अकबर ने लाहौर को राजधानी बनाया। अपनी मृत्यु के पूर्व अकबर ने सन 1599 में वापस आगरा को राजधानी बनाया और अन्त तक यहीं से शासन संभाला।
किसे अकबर ने स्वयं मारा था
माहम अनगा के पुत्र अधम खां को 1562 ई. में अकबर ने स्वयं मारा था क्योंकि उसने अकबर के प्रधानमंत्री अतगा खां की हत्या कर दी थी।
आधम ख़ान अकबर की धाय मां का पुत्र और मुगल फौज का एक सिपहसालार था। महाराजा मान सिंह से आधम खान की बेटी बीबी मुबारक का विवाह भी हुआ था।
अकबर के वजीर-ए-आज़म अतगा ख़ान के साथ दुश्मनी के चलते आधम खान ने उसकी हत्या कर दी। जिसके बाद क्रोध में अकबर ने आधम ख़ान को आगरा किले की दीवार से सिर के बल फेंक देने का आदेश दे दिया जिससे आधम ख़ान की मौत हो गई।
आधम की मौत के चालीसवें दिन ग़म के मारे उसकी मां माहम अनघा की भी मौत हो गई। मां बेटे दोनों को महरौली में बने मकबरे में दफनाया गया। मकबरे का निर्माण अकबर ने करवाया।
इतिहासकारों का मानना है कि ये मकबरा जानबूझकर लोदी वंश की इमारतों की अष्टकोणीय शैली में बनवाया गया। शायद ऐसा आधम को गद्दार करार देने के लिए किया गया। क्योंकि मुग़लों की नज़र में लोदी सुल्तान गद्दार थे।
1830 में बंगाल सिविल सेवा के एक अंग्रेज अफसर ब्लेक ने इस मकबरे को अपना निवास स्थल बना लिया और मकबरे के बीचोबीच अपने डाइनिंग हॉल तक रास्ता साफ करने के लिए इसके अंदर बनी कब्रों को हटा दिया। हालांकि उस अफसर की जल्द ही मौत हो गई लेकिन लंबे समय तक ये मकबरा अंग्रेज अफसरों के लिए अतिथिगृह बना रहा। बाद के दिनों में कुछ समय तक इस मकबरे को पुलिस थाने और बाद में डाकघर के रूप में भी इस्तेमाल किया गया। लेकिन ब्रिटिश वायसराय लॉर्ड कर्ज़न के आदेश के बाद इस मकबरे को खाली करके कब्रों का पुनर्निर्माण किया गया।
वैवाहिक संबंध
अकबर ने सर्वप्रथम कछवाहा राजपूतों से वैवाहिक संबंध स्थापित किए थे। जिस समय अकबर ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की दरगाह की यात्रा हेतु जा रहा था, तो सांगानेर नामक स्थान पर 1562 ई. में आमेर का राजा बिहारीमल (भारमल) बादशाह की सेवा में उपस्थित हुआ, उसने अकबर की अधीनता स्वीकार की तथा उससे अपनी ज्येष्ठ पुत्री हरखा बाई (लोक प्रचलित नाम- जोधाबाई) का विवाह करने की इच्छा भी व्यक्त की। अकबर ने राजा का प्रस्ताव स्वीकार कर लिया तथा अजमेर से लौटते समय सांभर में उसने राजा बिहारीमल की पुत्री से विवाह किया, यह अकबर का प्रथम राजपूत कन्या से विवाह था।
चिश्ती संत के दरगाह पर अकबर दर्शन हेतु अधिक जाता था
अकबर ने सूफी मत में अपनी आस्था जताते हुए चिश्तियां संप्रदाय को समर्थन दिया था। वह ख्वाजा मुइनुद्दीन चिश्ती की अजमेर स्थित दरगाह पर दर्शन हेतु अक्सर जाता था। इसके अतिरिक्त वह समकालीन सूफी संत शेख सलीम चिश्ती के दर्शन हेतु अक्सर सीकरी भी जाया करता था।
सीकरी में एक सूफ़ी सन्त शेख़ सलीम चिश्ती रहा करते थे। उनकी शोहरत सुनकर अकबर, एक पुत्र की कामना लेकर उनके पास पहुंचा और जब अकबर को बेटा हुआ तो अकबर ने उसका नाम सलीम रखा।
सीकरी में जहां सलीम चिश्ती रहते थे उसी के पास अकबर ने सन् 1571 में एक क़िला बनवाना शुरू किया।
अकबर की कई रानियाँ और बेगम थीं, किंतु उनमें से किसी से भी पुत्र नहीं हुआ था। अकबर पीरों एवं फ़कीरों से पुत्र प्राप्ति के लिए दुआ माँगता फिरता था। शेख सलीम चिश्ती ने अकबर को दुआ दी।
दैवयोग से अकबर की बड़ी रानी जो कछवाहा राजा बिहारीमल की पुत्री और भगवानदास की बहिन थी, गर्भवती हो गई, और उसने पुत्र को जन्म दिया। उसका नाम शेख के नाम पर सलीम रखा गया जो बाद में जहाँगीर के नाम से अकबर का उत्तराधिकारी हुआ।
अकबर शेख से बहुत प्रभावित था। उसने अपनी राजधानी सीकरी में ही रखने का निश्चय किया। सन् 1571 में राजधानी का स्थानांतरण किया गया। उसी साल अकबर ने गुजरात को फ़तह किया। इस कारण नई राजधानी का नाम फतेहपुर सीकरी रखा गया। सन्1584 तक लगभग 14 वर्ष तक फतेहपुर सीकरी ही मुग़ल साम्राज्य की राजधानी रही।
अकबर ने अनेक निर्माण कार्य कराये, जिससे वह आगरा के समान बड़ी नगरी बन गई थी। फतेहपुर सीकरी समस्त देश की प्रशासनिक गतिविधियों का प्रमुख केन्द्र थी।
सन् 1584 में एक अंग्रेज़ व्यापारी अकबर की राजधानी आया, उसने लिखा है− ‘आगरा और फतेहपुर दोनों बड़े शहर हैं। उनमें से हर एक लंदन से बड़ा और अधिक जनसंकुल है। सारे भारत और ईरान के व्यापारी यहाँ रेशमी तथा दूसरे कपड़े, बहुमूल्य रत्न, लाल, हीरा और मोती बेचने के लिए लाते हैं।
इबादत खाने का निर्माण
बादशाह अकबर ने धार्मिक चर्चा एवं विचार-विमर्श के लिए 1575 ई. में फतेहपुर सीकरी में एक इबादत खाना के निर्माण का आदेश दिया। इबादत खाना में बादशाह की अध्यक्षता में सैयद, शेख एवं उलेमा धार्मिक चर्चा किया करते थे।
1578 ई. में अकबर ने सभी धर्मावलंबियों के लिए ‘इबादत खाना’ का द्वार खोल दिया।
अकबर ने समस्त धार्मिक मामलों को अपने हाथों में लेने के लिए 1579 ई. में महजरनामा जारी करवाया, जिसने उसे धर्म के मामलों में सर्वोच्च बना दिया। इस पर पांच उलेमाओं या इस्लामी धर्मविदों के हस्ताक्षर थे। महजर को स्मिथ और वूल्जले हेग ने अचूक आज्ञा-पत्र (Infallibility Decree) कहा है। महजर जारी करने के बाद अकबर ने ‘सुल्तान-ए-आदिल’ या इमाम-ए-आदिल (इंसाफ करने वाला सर्वोच्च नेता) की उपाधि धारण की।
स्मिथ महोदय ने कहा था “दीन-ए-इलाही अकबर की मूर्खता का स्मारक है, उसकी बुद्धिमता का नहीं।“
'शाने फतेहपुर'
सम्राट अकबर द्वारा बसाए गए शहर फतेहपुर सीकरी (City of Victory) को वर्ष 1986 में यूनेस्को की विश्व धरोहर स्थल सूची में शामिल किया गया।
उत्तर प्रदेश में स्थित फतेहपुर सीकरी 1571 से 1585 ई. तक मुगल साम्राज्य की राजधानी रही। फतेहपुर सीकरी में मुगल वास्तुकला के स्मारक जैसे-जामा मस्जिद, बुलंद दरवाजा, पंच महल, शेख सलीम चिश्ती का मकबरा आदि शामिल हैं। यहां स्थित जामा मस्जिद को ‘शान-ए-फतेहपुर’ या ‘शान-ए-सीकरी’ के नाम से भी जाना जाता है।
फतेहपुर सीकरी में स्थित स्मारक:-
अकबर ने आगरा से 36 कि.मी. दूर फतेहपुर सीकरी में 1568-69 ई. में एक राजमहल-सह-किले का निर्माण आरंभ किया।
एक विशाल कृत्रिम झील से युक्त पहाड़ी पर बने इस किले में गुजरात और बंगाल शैलियों की कई इमारतें शामिल थीं। इनमें जोधाबाई महल, पंच महल, मरियम महल (स्वर्ण महल), दीवाने आम, दीवाने खास, बीरबल कोठी आदि प्रमुख हैं।
अकबरी महल आगरा के किले में स्थित है।
अकबर द्वारा बनवाई गई श्रेष्ठतम इमारतें फतेहपुर सीकरी में स्थित हैं। यहां स्थित प्रमुख इमारतों में दीवाने आम, दीवाने-खास, कोषागार, ज्योतिषी की बैठक, पंच महल, खास महल, तुर्की सुल्ताना की कोठी, जोधाबाई का महल, हवा महल, मरियम की कोठी, बीरबल की कोठी आदि हैं।
तुर्की सुल्ताना का महल इतना सुंदर है कि पर्सी ब्राउन ने उसे ‘स्थापत्य कला का मोती’ कहा है।
'बुलंद दरवाजा'
अकबर ने सीकरी का निर्माण 1568-69 में आरंभ करवाया था तथा बाद में गुजरात विजय (1572-73) के पश्चात इस नगरी को फतेहपुर सीकर कहा जाने लगा।
एक वर्ग के इतिहासकारों का मत है कि गुजरात विजय के उपलक्ष्य में सम्राट अकबर ने सीकरी के बुलंद दरवाजा का निर्माण विजय स्तंभ के रूप में कराया था,
जबकि पर्सी ब्राउन ने इसका निर्माण दक्षिण विजय (1601-02) के उपलक्ष्य में बताया है।
गुजरात एक समृद्ध, उन्नतिशील एवं व्यापारिक केन्द्र के रूप में प्रसिद्ध था। इसलिए अकबर इसे अपने अधिकार में करने हेतु उत्सुक था।
सितम्बर 1572 ई. में अकबर ने स्वयं ही गुजरात को जीतने के लिए प्रस्थान किया। उस समय गुजरात का शासक मुजफ्फर ख़ाँ तृतीय था। लगभग डेढ़ महीने के संघर्ष के बाद 26 फ़रवरी, 1573 ई. तक अकबर ने सूरत, अहमदाबाद एवं कैम्बे पर अधिकार कर लिया।
अकबर “ख़ाने आजम” मिर्जा अजीज कोका को गुजरात का गवर्नर नियुक्त कर वापस आगरा आ गया, किन्तु उसके आगरा पहुँचते ही सूचना मिली कि, गुजरात में मुहम्मद हुसनै मिर्ज़ा ने विद्रोह कर दिया है। अतः तुरन्त ही अकबर ने गुजरात की ओर मुड़कर 2 सितम्बर, 1573 ई. को विद्रोह को कुचल दिया।
अकबर के इस अभियान को स्मिथ ने “संसार के इतिहास का सर्वाधिक द्रुतगामी आक्रमण” कहा है। इस प्रकार गुजरात अकबर के साम्राज्य का एक पक्का अंग बन गया। उसके वित्त तथा राजस्व का पुनर्सगंठन टोडरमल ने किया, जिसका कार्य उस प्रान्त में शिहाबुद्दीन अहमद ने 1573 ई. से 1584 ई. तक किया। गुजरात में ही अकबर सर्वप्रथम पुर्तगालियों से मिला और यहीं पर उसने पहली बार समुद्र को देखा।
गुजरात को जीतने के बाद अकबर ने पूरे उत्तर भारत में “करोड़ी” नाम के एक अधिकारी की नियुक्ति की। इस अधिकारी को अपने क्षेत्र से एक करोड़ दाम वसूल करना होता था।
“करोड़ी” की सहायता के लिए “आलिम” नियुक्त किये गए। ये क़ानूनगों (माल या राजस्व महकमे का वह क्षेत्रीय अधिकारी जो पटवारियों या लेखपालों के कागज़ात एवं काम-काज की जाँच करता है।) द्वारा बताये गये आंकड़े की भी जाँच करते थे। वास्तविक उत्पादन, स्थानीय क़ीमतें, उत्पादकता आदि पर उनकी सूचना के आधार पर अकबर ने 1580 ई. में ‘दहसाला’ नाम की नवीन प्रणाली को प्रारम्भ किया।
किस इमारत का नक्शा बौद्ध विहार की तरह है
अकबर ने अपनी नवीन राजधानी फतेहपुर सीकरी में अनेक भवन बनवाए। पंच महल पिरामिड के आकार का पांच महलों का भवन था और भारतीय बौद्ध विहारों के अनुरूप था, जो अब तक भारत के कुछ भागों में विद्यमान हैं। ऊपर की ओर छोटी होने वाली पांच मंजिलों वाला यह आयताकार भवन नालंदा आदि में बने हुए बहु मंजिला बौद्ध विहारों से ली गई प्रेरणा पर आधारित है।
अकबर के साथ युद्ध करने वाली दुर्गावती
1564 ई. में अकबर ने कड़ा तथा पूर्वी प्रदेशों के शासक आसफ खां को गढ़कटंगा (गोंडवाना में) के राज्य को जीतने के लिए भेजा। इस राज्य में मोटे तौर पर आधुनिक मध्य प्रदेश के उत्तरी जिले पड़ते हैं। उसका राजा वीरनारायण अल्पवयस्क था, परंतु उसकी मां दुर्गावती राज्य पर योग्यतापूर्वक शासन करती थी। उसने वीरतापूर्वक शाही दल का विरोध किया, परंतु गढ़ एवं मंडला (वर्तमान जबलपुर जिले में) के बीच हुए युद्ध में वह पराजित हुई।
रानी दुर्गावती मडावी के इस सुखी और सम्पन्न राज्य पर मालवा के मुसलमान शासक बाजबहादुर ने कई बार हमला किया, पर हर बार वह पराजित हुआ।
मुग़ल शासक अकबर ने रानी के प्रिय सफेद हाथी (सरमन) और उनके विश्वस्त वजीर आधारसिंह को भेंट के रूप में अपने पास भेजने को कहा। रानी ने यह मांग ठुकरा दी।
इस पर अकबर ने अपने एक रिश्तेदार आसफ खां के नेतृत्व में गोण्डवाना साम्राज्य पर हमला कर दिया। एक बार तो आसफ खां पराजित हुआ, पर अगली बार उसने दुगनी सेना और तैयारी के साथ हमला बोला।
दुर्गावती के पास उस समय बहुत कम सैनिक थे। उन्होंने जबलपुर के पास नरई नाले के किनारे मोर्चा लगाया तथा स्वयं पुरुष वेश में युद्ध का नेतृत्व किया। इस युद्ध में 3,000 मुगल सैनिक मारे गये लेकिन रानी की भी अपार क्षति हुई थी।
अगले दिन 24 जून 1564 को मुगल सेना ने फिर हमला बोला। आज रानी का पक्ष दुर्बल था, अतः रानी ने अपने पुत्र नारायण को सुरक्षित स्थान पर भेज दिया। तभी एक तीर उनकी भुजा में लगा, रानी ने उसे निकाल फेंका। दूसरी तीर ने उनकी आंख को बेध दिया, रानी ने इसे भी निकाला पर उसकी नोक आंख में ही रह गयी। तभी तीसरा तीर उनकी गर्दन में आकर धंस गया।
रानी ने अंत समय निकट जानकर वजीर आधारसिंह से आग्रह किया कि वह अपनी तलवार से उनकी गर्दन काट दे, पर वह इसके लिए तैयार नहीं हुआ। अतः रानी अपनी कटार स्वयं ही अपने पेट में भोंककर आत्म बलिदान के पथ पर बढ़ गयीं। महारानी दुर्गावती चंदेल ने अकबर के सेनापति आसफ़ खान से लड़कर अपनी जान गंवाने से पहले पंद्रह वर्षों तक शासन किया था।
राजपूत शासक ने मुगलों के विरुद्ध निरंतर स्वतंत्रता का संघर्ष जारी रखा और समर्पण नहीं किया:- मारवाड़ के राव चंद्रसेन
1565 ई. में मारवाड़ के शासक राव चंद्रसेन ने भाद्राजूण में मुगल सेनाओं का सामना किया लेकिन चारों तरफ से घिर जाने के कारण उसे सिवाना जाना पड़ा। मुगल सेना ने उसे ढूंढ़ने के लिए अनेक प्रयास किए।
राव चंद्रसेन ने 1579 ई. में सोजत पर अधिकार कर लिया। अतः अकबर ने पुनः सेनाएं भेज कर उस पर आक्रमण करवाया लेकिन वह पहाड़ी क्षेत्रों में चला गया और 1581 ई. में उसकी मृत्यु हो गई।
महाराणा प्रताप की भांति ही उसने मुगलों से निरंतर संघर्ष किया तथा समर्पण नहीं किया।
राव चन्द्रसेन जोधपुर, राजस्थान के राव मालदेव के छठे पुत्र थे। हालांकि इन्हें मारवाड़ राज्य की सिवाना जागीर दे दी गयी थी, पर राव मालदेव ने इन्हें ही अपना उत्तराधिकारी चुना था। राव मालदेव की मृत्यु के बाद राव चन्द्रसेन सिवाना से जोधपुर आये और विक्रम संवत 1619 को जोधपुर की राजगद्दी पर बैठे ।
राव चन्द्रसेन अपने भाइयों में छोटे थे, फिर भी उनके संघर्षशील व्यक्तित्व के चलते राव मालदेव ने अपने जीते जी इन्हें ही अपना उत्तराधिकारी चुन लिया था।
चन्द्रसेन के जोधपुर की गद्दी पर बैठते ही इनके बड़े भाइयों राम और उदयसिंह ने राजगद्दी के लिए विद्रोह कर दिया। राम को चन्द्रसेन ने सैनिक कार्रवाई कर मेवाड़ के पहाड़ों में भगा दिया तथा उदयसिंह, जो उसके सहोदर थे, को फलौदी की जागीर देकर संतुष्ट किया।
राम ने अकबर से सहायता ली। अकबर की सेना मुग़ल सेनापति हुसैन कुली ख़ाँ के नेतृत्व में राम की सहायतार्थ जोधपुर पहुंची और जोधपुर के क़िले मेहरानगढ़ को घेर लिया। आठ माह के संघर्ष के बाद राव चन्द्रसेन ने जोधपुर का क़िला ख़ाली कर दिया और अपने सहयोगियों के साथ भाद्राजूण चले गए और यहीं से अपने राज्य मारवाड़ पर नौ वर्ष तक शासन किया। भाद्राजूण के बाद वह सिवाना आ गए।
हल्दी घाटी का युद्ध 1576 ई.
अकबर ने युद्ध से पूर्व सन्धि के कई प्रयास किए एवं अपने दूत राणा के पास भेजे।
पहला दूत जलाल खान कुरची था, जो अकबर का एक पसंदीदा नौकर था, जो अपने मिशन में असफल था। इसके बाद, अकबर ने कच्छवा वंश के साथी राजपूत अम्बर (बाद में, जयपुर) को भेजा, जिसकी किस्मत मुगलों के अधीन थी। लेकिन वह भी प्रताप को समझाने में नाकाम रहे। राजा भगवंत दास अकबर की तीसरी पसंद थे, और उन्होंने अपने पूर्ववर्तियों से बेहतर प्रदर्शन किया।
राणा प्रताप ने अपने युवा बेटे, अमर सिंह को मुगल दरबार में भेजा था। हालांकि, यह अकबर द्वारा असंतोषजनक माना जाता रहा, जो खुद चाहते थे कि राणा उन्हें व्यक्तिगत रूप से प्रस्तुत करें।
एक अंतिम दूत टोडरमल को बिना किसी अनुकूल परिणाम के मेवाड़ भेज दिया गया। प्रयास विफल होने के साथ, युद्ध तय था।
हल्दी घाटी युद्ध के पीछे अकबर का मुख्य उद्देश्य राणा प्रताप को अपने अधीन लाना था।
अकबर ने अप्रैल, 1576 में मानिसंह के नेतृत्व में 5 हजार सैनिकों को राणा प्रताप के विरुद्ध भेजा। मानिसंह हल्दी घाटी दर के निकट पहुंचा, राणा प्रताप भी मुगल सेना का सामना करने के लिए पहाड़ियों से उतर आए। फलतः जो युद्ध हुआ, वह हल्दी घाटी युद्ध के नाम से प्रसिद्ध है, जिसमें राणा पराजित हुए और उन्हें अरावली की पहाड़ियों में शरण लेनी पड़ी।
हल्दी घाटी के युद्ध में महाराणा प्रताप की सेना के सेनापति
हल्दी घाटी का युद्ध 1576 ई. में महाराणा प्रताप और मुगल सेनापति मानिसंह एवं आसफ खां के मध्य लड़ा गया। राजपूत योद्धाओं के अलावा राणा की सेना के अग्रभाग का नेतृत्व अफगानों की एक टुकड़ी के साथ हकीम खान सूर कर रहा था।
ये अफगान बादशाह शेरशाह सूरी के वंशज थे । महाराणा प्रताप का साथ देने के लिए ये बिहार से मेवाड़ आए व अपने 800 से 1000 अफगान सैनिकों के साथ महाराणा के सामने प्रस्तुत हुए। हकीम खान सूरी को महाराणा ने मेवाड़ का सेनापति घोषित किया।
राणा की सेना में भीलों (राणा पूंजा भील) की भी एक छोटी-सी टुकड़ी शामिल थी। यह राणा की मुगलों के साथ आमने-सामने की आखिरी मुठभेड़ थी। आगे उन्होंने छापामार युद्ध का सहारा लिया।
हल्दीघाटी असल में एक दर्रा है, अरावली पर्वत श्रृंखला से गुजरने वाला दर्रा, जो राजस्थान में उदयपुर से करीब 40 किमी दूर है, इस दर्रे की मिट्टी हल्दी की तरह पीली है, इसलिए प्रचलित नाम हल्दीघाटी पड़ा। यह राजस्थान में राजसमंद और पाली जिलों को जोड़ता है।
मेवाड़ राज्य ने अकबर की संप्रभुता स्वयं स्वीकार नहीं की थी। वहां के शासक राणा प्रताप ने लंबे समय तक मुगलों से युद्ध लड़ा। राणा प्रताप की के बाद उनके पुत्र राणा अमर सिंह ने 1615 ई. में जहांगीर से संधि की थी।
अकबर ने बंगाल तथा बिहार को मुगल साम्राज्य में मिलाया
1572 ई. में सुलेमान करारानी की मृत्यु के बाद उसका पुत्र दाऊद खां गद्दी पर बैठा। दाऊद खां ने अपने को स्वतंत्र घोषित कर पटना के मुगल किले पर आक्रमण किया। अकबर ने मुनीम खां को दाऊद पर आक्रमण करने तथा बिहार को जीतने का आदेश दिया।
मुनीम खां ने दाऊद को एक युद्ध में पराजित किया तथा 1574 ई. में बिहार पर मुगलों का आधिपत्य हो गया। पराजित होने के बाद दाऊद बंगाल भाग गया। किंतु 12 मार्च, 1576 को टोडरमल, मुजफ्फर खां एवं हुसैन कुली खां ने मिलकर दाऊद को पूर्णतः पराजित किया। इस प्रकार 1576 ई. में बंगाल तथा बिहार को पूर्ण रूप से मुगल साम्राज्य में मिला लिया गया।
अबुल फजल
मृत्यु
जब शाहजादा सलीम ने विद्रोह कर इलाहाबाद में स्वतंत्र शासक की तरह व्यवहार करना आरंभ कर दिया था, तब अकबर ने 1602 ई. में दक्षिण से अपने मित्र अबुल फजल को बुलाया। उसी समय सलीम के इशारे से ओरछा के बुंदेला सरदार विरसिंह देव ने मार्ग में अबुल फजल की हत्या कर दी।
जहांगीर जब सम्राट बना तब उसने वीर सिंह देव को 3000 का मनसब प्रदान किया था। अतः अबुल फजल की मृत्यु में शहजादा सलीम की भूमिका स्पष्ट थी।
अकबर को राष्ट्रीय सम्राट सिद्ध करने में सहायक
(१) प्रशासकीय एकता और कानूनों की एकरूपता
(२) अकबर द्वारा सांस्कृतिक एकता का प्रयत्न
(३) अकबर की धार्मिक नीति
अकबर पहला मुस्लिम शासक था जिसने इस बात का अनुभव किया कि मुगल साम्राज्य की सुदृढ़ता के लिए भारत की बहुसंख्यक हिंदू जनता का सहयोग प्राप्त करना नितांत आवश्यक है। उसने हिंद-ूमुस्लिम समुदायों को राष्ट्रीय एकता के सूत्र में बांधने का प्रयास किया।
अकबर का भारत को राजनीतिक एकता प्रदान करने का प्रयत्न, उसकी समान शासन व्यवस्था, समान अर्थ एवं लगान व्यवस्था, समान कर व्यवस्था, सभी को योग्यता के आधार पर राज्य की सेवाओं में उच्चतम स्थान प्राप्त करने की सुविधा, राजपूतों से विवाह-संबंध और सम्मान की नीति, सभी धर्मों को समान सुविधा और आदर तथा धार्मिक दृष्टि से एकता लाने का प्रयत्न, फारसी भाषा को राजभाषा बनाना किंतु सभी भाषाओं की प्रगति में सहयोग, विभिन्न ललित कलाओं की प्रगति तथा उनकी कलाविधियों के समन्वय का प्रयत्न, सांस्कृतिक एकता का प्रयत्न आदि सभी ऐसे कार्य थे, जो राष्ट्रीय हित और प्रगति के आधार पर किए गए थे।
इस कारण अकबर को राष्ट्रीय सम्राट स्वीकार किया गया। अकबर ने इस्लाम धर्म का त्याग नहीं किया था।
अकबर की लोकप्रियता के कारण
मुगल शासन व्यवस्था को स्थापित करने का श्रेय अकबर को ही है। उसकी केंद्रीय शासन व्यवस्था तथा बादशाह के पद और अधिकारों एवं कर्तव्यों की व्याख्या, उसका प्रांतीय शासन, उसकी लगान व्यवस्था, उसकी मुद्रा व्यवस्था, उसकी मनसबदारी व्यवस्था आदि सभी को उसके समय में सफलता प्राप्त हुई और वह उसके उत्तराधिकारियों के लिए आधार-स्वरूप बनीं।
अकबर प्रथम मुस्लिम शासक था जिसने हिंदू और मुसलमानों को निकट लाने का प्रयास किया। अपनी उदार धार्मिक नीति के अंतर्गत उसने 1562 ई. में दास प्रथा, 1563 ई. में तीर्थयात्रा कर तथा 1564 ई. में जजिया कर को समाप्त कर दिया।
अपने सामाजिक सुधार के अंतर्गत उसने बाल विवाह एवं सती प्रथा को रोकने का प्रयत्न किया।
मनसबदारी व्यवस्था :
“मनसब” फारसी भाषा का शब्द है। इस शब्द का अर्थ है पद, दर्जा या ओहदा। जिस व्यक्ति को सम्राट मनसब देता था, उस व्यक्ति को मनसबदार (Mansabdar) कहा जाता था।
अकबर ने अपने प्रत्येक सैनिक और असैनिक अधिकारी को कोई-न-कोई मनसब (पद) अवश्य दिया। इन पदों को उसने जात या सवार नामक दो भागों में विभाजित किया था।
जात का अर्थ है व्यक्तिगत पद या ओहदा और सवार का अर्थ घुड़सवारों की उस निश्चित संख्या से है जिसे किसी मनसबदार को अपने अधिकार में रखने का अधिकार होता था।
इस तरह मनसब शब्द केवल सैनिक व्यवस्था का ही शब्द नहीं अपितु इसका अर्थ है वह पद जिसपर सैनिक और गैर-सैनिक अधिकारी को नियुक्त किया जाता या रखा जाता था।
दूसरे शब्दों में, मनसब पद प्रतिष्ठा अथवा अधिकार प्राप्त करने की स्थिति थी। इससे व्यक्ति का पद, स्थान और वेतन निर्धारित होता था।
अकबर ने जात और सवार मनसबदारों को तीन श्रेणियों में विभाजित किया था – जिस व्यक्ति को जितना अधिक ऊँचा जात (व्यक्तिगत) मनसब दिया जाता था, वह उतने ही अधिक घुड़सवार रखने का अधिकारी भी होता था और उसे प्रथम श्रेणी का मनसब कहा जाता था।
अकबर के काल में सबसे छोटा या निम्न मनसब (पद) दस सिपाहियों के ऊपर अधिकार रखने का था और उच्चतम दस हजार घुड़सवारों पर अधिकार रखने का था। बाद में अकबर ने उच्चतम मनसब की सीमा बढ़ाकर 12 हजार कर दी थी।
जो मनसबदार अपने जात (व्यक्तिगत) से आधी संख्या या आधे से अधिक घुड़सवार रख सकता था, वह दूसरी श्रेणी का मनसबदार होता था।
जिस मनसबदार को अपने जात (व्यक्तिगत पद) से आधे से कम घुड़सवार रखने का अधिकार था, उसे तीसरी श्रेणी का मनसबदार कहा जाता था।
सभी मनसबदारों को एक घुड़सवार के लिए दो घोड़े रखने अनिवार्य होते थे। किसी भी मनसबदार को जात पद के अनुसार ही सवार रखने की अनुमित थी।
“मुगल मनसबदारी प्रणाली मध्य एशिया (मंगोलिया) से ली गई थी। इस प्रकार का सैन्य विभाजन चंगेज खान के नेतृत्व में मंगोल सेना में किया गया था। अकबर द्वारा प्रारंभ मनसबदारी प्रणाली यद्यपि काफी हद तक नवीन थी तथापि यह मूलतः मंगोल सैन्य विभाजन पर आधारित थी”।
मनसबदारों की नियुक्ति :
मनसबदारों की नियुक्ति सम्राट स्वयं करता था और उसकी मर्जी होने तक ही वे पद पर बने रह सकते थे। प्रायः सात हजार का मनसब राजघराने के लोगों या बहुत ही महत्त्वपूर्ण और विश्वसनीय सरदारों जैसे राजा मानिसंह, मिर्ज़ा शाहरुख और मिर्ज़ा अजीज कोका को ही दिया गया।
सम्राट ने राजकुमारों को ही 12 हजार तक मनसब दिए।
मिर्ज़ा शाहरुख सम्राट अकबर के दूर के रिश्तेदार तैमूरिद चचेरे भाई और बदख्शां के शासक थे, जब तक कि उन्हें वहाँ से मुगल साम्राज्य को भागने के लिए मजबूर नहीं किया गया था।
उन्होंने अकबर की बेटी शकर अल -निसा बेगम से शादी की और उन्हें मालवा का गवर्नर बनाया गया।
मुग़ल मनसबदारों को बहुत अच्छा वेतन मिलता था। उन्हें प्रायः नकद में वेतन दिया जाता था। परन्तु कभी-कभी जागीर का राजस्व भी वेतन के स्थान पर दे दिया जाता था।
उन्हें अपनी व्यक्तिगत आय और वेतन से ही अपने स्वयं के अधीन घुड़सवारों और घोड़ों का खर्च चलाना होता था।
भू राजस्व व्यवस्था :
आइन-ए-दहसाला मुग़ल साम्राज्य में बादशाह अकबर के शासन काल में राजा टोडरमल द्वारा स्थापित की गई भू-राजस्व व्यवस्था की पद्धति थी।
अकबर के शासन काल में 1571 से 1580 ई. (10 वर्षों) के आंकड़ों के आधार पर भू-राजस्व का औसत निकालकर ‘आइन-ए-दहसाला’ प्रणाली को लागू किया गया था।
इस प्रणाली के अन्तर्गत राजा टोडरमल ने अलग-अलग फ़सलों पर नकद के रूप में वसूल किये जाने वाले लगान का क़रीब 10 वर्ष का औसत निकालकर, उस औसत का एक-तिहाई भू-राजस्व के रूप में निश्चित किया।
कालान्तर में इस प्रणाली में सुधार के अन्तर्गत न केवल स्थानीय क़ीमतों को आधार बनाया गया, बल्कि कृषि उत्पादन वाले परगनों को विभिन्न कर हलकों में बांटा गया।
अब किसान को भू-राजस्व स्थानीय क़ीमत एवं स्थानीय उत्पादन के अनुसार देना होता था। “आइन-ए-दहसाला” व्यवस्था को “टोडरमल बन्दोबस्त” भी कहा जाता था।
इस व्यवस्था के अन्तर्गत भूमि की पैमाइश हेतु उसे 4 भागों में विभाजित किया गया –
1. पोलज भूमि – इस भूमि पर नियमित रूप से खेती होती थी।
2. परती भूमि – यह भूमि उर्वरा-शक्ति प्राप्त करने हेतु एक या दो वर्ष तक परती पड़ी रहती थी।
3. छच्छर या चाचर भूमि – ऐसी भूमि, जिस पर लगभग तीन या चार वर्षों तक खेती नहीं की जाती थी।
4. बंजर भूमि – निकृष्ट कोटि की भूमि, जिसे लगभग 5 वर्षों तक काश्त के प्रयोग में लाया गया हो।
लगान खेती के लिए प्रयुक्त भूमि पर ही वसूला जाता था।
'प्रबुद्ध निरंकुश'
अकबर एक महान शासक था जिसका साम्राज्य अफ़गानिस्तान-कश्मीर से लेकर गोदावरी नदी के किनारे तक विस्तृत था।
वह एक धर्मनिरपेक्ष शासक था। संपूर्ण सत्ता उसी में निहित थी, अतएव वह प्रशा के फ्रेडरिक महान और इंग्लैंड की रानी एलिजाबेथ की तरह प्रबुद्ध निरंकुश शासक कहा जाता है, जिसके शासनकाल में कानून की दृष्टि में सभी समान थे।
प्रशा राज्य में वर्तमान समय के जर्मनी, पोलैण्ड, रूस, लिथुआनिया, डेनमार्क, बेल्जियम और चेक गणराज्य के भाग सम्मिलित थे।
सामाजिक परंपराओं और व्यक्तिगत मान्यताओं पर अंकुश
अकबर ने कुछ सामाजिक परंपराओं और व्यक्तिगत मान्यताओं पर अंकुश अवश्य लगाया परंतु उसने यह कार्य सुधार की दृष्टि से किया। उदाहरण के लिए उसने आज्ञा दी कि आदमी को एक ही स्त्री से विवाह करना चाहिए और वह तभी दूसरा विवाह कर सकता है, जब उसकी पहली पत्नी बन्ध्या हो।
उसने हिंदू विधवाओं को पुनर्विवाह करने का अधिकार दे दिया तथा बलपूर्वक स्त्रियों के सती होने पर रोक लगा दी।
अकबर का शासन जाना जाता है
(१) क्षेत्रों को जीतने के लिए
(२) अपनी प्रशासनिक व्यवस्था के लिए
(३) न्यायिक प्रशासन के लिए
अकबर अपनी धार्मिक उदारता एवं धार्मिक सहिष्णुता के लिए जग प्रसिद्ध है। उसके द्वारा प्रतिपादित सुलह-ए-कुल की नीति इसका सबल प्रमाण है।
अकबर ने यह महसूस किया कि सभी धर्मों का एक ही उद्देश्य है। अतः उसने सर्व धर्म समन्वय अर्थात सब धर्मों की अच्छी बातें लेने का मार्ग पकड़ा।
इसी को उसने ‘सुलह कुल’ कहा।
इस तरह सब धर्मों की अच्छी बातों को लेकर उसने दीन-ए-इलाही चलाया।
इसमें इस्लाम का एकेश्वरवाद था, तो पारसी धर्म के अनुसार सूर्य और अग्नि उस ईश्वर के प्रकाश और तेज के रूप में पूजनीय थे। हिन्दू और जैन धर्मों के अहिंसावाद की इस धर्म पर गहरी छाप थी।
यह तर्क दिया गया है कि दीन-ए-इलाही का एक नया धर्म होने का सिद्धांत गलत धारणा है, जो कि बाद में ब्रिटिश इतिहासकारों द्वारा अबुल फजल के कार्यों के गलत अनुवाद के कारण पैदा हुआ था। हालांकि, यह भी स्वीकार किया जाता है कि सुलह-ए-कुल की नीति, जिसमें दीन-ए-इलाही का सार था, अकबर ने केवल धार्मिक उद्देश्यों के लिए नहीं बल्कि सामान्य शाही प्रशासनिक नीति का एक भाग के रूप में अपनाया था।
“अकबर द्वारा प्रवर्तित ‘दीन-ए-इलाही कोई धर्म नहीं था, अपितु एक सूफी मत था जिसके नियम सर्वधर्म समन्वय पर आधारित थे।
जहांगीर के समकालीन मोहसिन फानी ने अपनी रचना ‘दबिस्तान-ए-मजाहिब में पहली बार दीन-ए-इलाही का एक स्वतंत्र धर्म के रूप में उल्लेख किया था”।
सैनिक विभाग का प्रमुख
अकबर के शासनकाल में पुर्नगठित केंद्रीय प्रशासन तंत्र के अंतर्गत “मीर बख्शी” मुख्यतः सैन्य विभाग का प्रमुख था, किंतु उसे प्रधान सेनापति नहीं कहा जा सकता।
उसका कार्य सैनिकों के वेतन एवं सैनिक संगठन से संबंधित था। वह मनसबदारों की सूची रखता था तथा उसे बादशाह अकबर के समक्ष प्रस्तुत करता था। सैनिकों की भर्ती, उनके शस्त्रों की व्यवस्था, सैनिकों का निरीक्षण आदि उसके कार्यों के अंतर्गत था।
साम्राज्य के विस्तार एवं शांति-सुव्यवस्था के लिए सुसंगठित सेना का होना अत्यंत आवश्यक था। इस दृष्टि से अकबर ने अपनी सैन्य व्यवस्था की अनेक त्रुटियों में सुधार किया।
उसने 1573 ई. में घोड़ों को दागने की प्रथा का पुनः प्रचलन किया जिससे सेनापति अपने घोड़े न बदल सकें अथवा एक घोड़े को दो बार न प्रस्तुत कर सकें।
इसके पश्चात 1574-75 ई. में अकबर ने मनसबदारी व्यवस्था के आधार पर सैनिक संगठन किया।
‘मनसब’ शब्द का अर्थ श्रेणी या पद है तथा ‘मनसबदार’ का अर्थ उस अधिकारी से था, जिसे शाही सेना में एक पद या श्रेणी प्राप्त थी। अकबर की मनसबदारी व्यवस्था दशमलव प्रणाली पर आधारित थी।
अकबर द्वारा दीवान का पूर्णरूपेण दर्जा दिया जाने वाला प्रथम व्यक्ति
दीवान’ शब्द फारसी भाषा का है और खलीफा उमर के काल में मुसलमानों ने इसे अपनाया था। वे इसका प्रयोग खजाना विभाग के लिए करते थे। अकबर के शासनकाल के 9वें वर्ष से लेकर 30वें वर्ष तक दीवान पद मुजफ्फर खां तुरबती, राजा टोडरमल एवं ख्वाजा शाह मंसूर के हाथों आता-जाता रहा। मुजफ्फर खां सरकारी सोपान में दीवान के पद को स्थान दिलाने में सफल रहा। ‘दीवान’ आर्थिक मामलों एवं राजस्व का सर्वोच्च अधिकारी होता था।
जब्ती प्रणाली
अकबर के शासनकाल में भू-राजस्व वसूली के लिए जब्ती प्रणाली का प्रचलन हुआ, जो भूमि सर्वेक्षण, भू-राजस्व निर्धारण के लिए दस्तूर-उल-अमल तथा जब्ती खसरे की तैयारी पर आधारित थी। साम्राज्य के अधिकतर भू-भाग में यही प्रणाली प्रचलित थी।
जाब्ती प्रणाली मुग़ल साम्राज्य में बादशाह अकबर के शासन काल में राजा टोडरमल द्वारा स्थापित की गई भू-राजस्व व्यवस्था की प्रणाली थी।
अकबर के शासन काल के 15वें वर्ष, लगभग 1570-1571 ई. में टोडरमल ने खालसा भूमि पर भू-राजस्व की नवीन प्रणाली, जिसका नाम “जाब्ती” था, को प्रारम्भ किया। इस प्रणाली में भूमि की पैमाइश एवं खेतों की मूल वास्तविक पैदावार को आंकने के आधार पर कर की दरों को निर्धारित किया जाता था।
यह प्रणाली बिहार, लाहौर, इलाहाबाद, मुल्तान, दिल्ली, अवध, मालवा एवं गुजरात में प्रचलित थी।
जाब्ती प्रणाली में कर निर्धारण की दो श्रेणी थी, एक को “तखशीस” या कर निर्धारण कहते थे और
दूसरे को “तहसील” व ‘वास्तविक वसूली’ कहते थे।
लगान निर्धारण के समय राजस्व अधिकारी द्वारा लिखे गये पत्र को “पट्टा”, “कौल” या “कौलकरार” कहा जाता था।
उपर्युक्त प्रणाली के अन्तर्गत उपज के रूप में निर्धारित भू-राजस्व को नक़दी के रूप में वसूल करने के लिए विभिन्न फ़सलों के क्षेत्रीय आधार पर नक़दी भू-राजस्व अनुसूची तैयार की जाती थी।
भू-राजस्व प्रशासन के क्षेत्र में शेरशाह एवं अकबर के मध्य नैरन्तर्य की कड़ी
इतिहास प्रसिद्ध टोडरमल भू-राजस्व प्रशासन की दृष्टि से विशेष सम्मान प्राप्त है। अकबर के द्वारा ही आइने-दहसाला (टोडरमल बंदोबस्त) की शुरुआत की गई थी। इस प्रणाली के प्रणेता टोडरमल ही थे (ख्वाजा शाह मंसूर से भी इसमें मदद मिली थी)। अतएव इसे टोडरमल बंदोबस्त के नाम से भी जाना जाता है।
टोडरमल
टोडरमल का जन्म उत्तर प्रदेश में सीतापुर के करीब लोहार में एक परिवार में हुआ था।
जब वे छोटे थे तभी उनके पिता की मृत्यु हो गई। उनके लिए आजीविका का कोई साधन नहीं था। उन्होंने अपना जीवन सामान्य लेखक के रूप से शुरू किया था।
शेरशाह सूरी ने, पंजाब, के रोहतास के एक नए किले के निर्माण के लिए टोडरमल को भेजा, जिससे उन्हें छापेमारी को रोकने और उत्तर-पश्चिम में मुगलों के लिए बाधा का कार्य करना था।
मुगलों द्वारा सूर वंश को उखाड़ फेंके जाने के बाद, टोडरमल शासक सत्ता की सेवा में लगे रहे, जो अब मुगल सम्राट अकबर था। अकबर के अधीन, उन्हें आगरा का प्रभारी नियुक्त किया गया। बाद में, उन्हें गुजरात का राज्यपाल बनाया गया। कई बार, उन्होंने बंगाल में अकबर की टकसाल का प्रबंधन भी किया और पंजाब में भी सेवा की।
टोडरमल का सबसे महत्वपूर्ण योगदान, जिसे आज भी सराहा जाता है, वह यह है कि उन्होंने अकबर के मुगल साम्राज्य की राजस्व प्रणाली की नई व्यवस्था कर दी।
राजा टोडरमल ने उत्तर प्रदेश के सीतापुर जिले के लहरपुर में अपने लिये एक किले-महल का निर्माण किया था।
टोडरमल ने भी भागवत पुराण का फारसी में अनुवाद किया था।
8 नवंबर 1589 को लाहौर में टोडरमल की मृत्यु के बाद, उनके शरीर का हिंदू परंपराओं के अनुसार अंतिम संस्कार किया गया। समारोह में लाहौर के प्रभारी उनके सहयोगी राजा भगवान दास उपस्थित थे।
अकबर के शिक्षा संबंधी सुधार कार्य
मुगल साम्राज्य के अंतर्गत सामाजिक सांस्कृतिक गतिविधियों के विकास के साथ-साथ शिक्षा संबंधी विषयों पर भी ध्यान दिया गया, शिक्षा संबंधी महत्वपूर्ण सुधार मुगल शासक अकबर द्वारा किया गया।
अकबर के शासनकाल में शिक्षा के कुछ महत्वपूर्ण केंद्र अजमेर, दिल्ली, सियालकोट, मुल्तान, इलाहाबाद, मुर्शिदाबाद आदि थे, इनमें छात्रों को मुफ्त शिक्षा दी जाती थी।
फारसी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त था। निजामी शिक्षा पद्धति तत्कालीन समय में ख्यात शिक्षा प्रणाली थी।
यद्यपि शिक्षा में महत्वपूर्ण सुधार करने वाला मुगल शासक अकबर स्वयं निरक्षर था।
अकबर के शासनकाल में पाठ्यक्रम में परिवर्तन किया गया, जिसमें हिन्दुओं और मुसलमानों को समान रूप से मदरसों में शिक्षा मिल सके ।
अकबर का विचार था कि हिन्दुओं को केवल इस्लामी शिक्षा देने से साम्राज्य की सुरक्षा को खतरा हो सकता है। इसीलिए उसने हिन्दुओं को उच्च शिक्षा देने के लिए मदरसों की स्थापना की, जहाँ उन्हें हिन्दू–धर्म, दर्शन और साहित्य की शिक्षा फारसी भाषा के साथ-साथ दी जाती थी।
औरंगजेब ने शिक्षा पद्धति के दोषों को दूर करने का प्रयास किया। उसे स्वयं अनुभव था कि उसके गुरु ने उसे उचित शिक्षा नहीं दी। इसीलिए वह चाहता था कि विद्यार्थी को जो शिक्षा दी जाए वह उपयोगी हो। वह इतिहास, भूगोल, युद्ध कला, राजनीति, दर्शनशास्त्र और कूटनीति आदि विषयों के अध्ययन पर बल देता था।
औरंगजेब का ध्यान राजकीय परिवार के सदस्यों को शिक्षित करने की तरफ अधिक था। उसने जन साधारण की प्रगति की तरफ ध्यान नहीं दिया।
कानून की शिक्षा भी मदरसे में दी जाती थी। चिकित्सा के क्षेत्र में इस्लामी शिक्षा का स्तर गिरा हुआ था।
संगीत की शिक्षा भी दी जाती थी। यह काफी लोकप्रिय थी।
शिक्षा प्रणाली:
मकतब में अधिकतर मौखिक शिक्षा दी जाती थी। अकबर ने शिक्षा पद्धति में परिवर्तन करना आवश्यक समझा।
प्रचलित ढंग की शिक्षा से बालकों को वर्णमाला सीखने में बहुत अधिक समय लगा था। इसीलिए उसने शिक्षा में सुधार कर वैज्ञानिक ढंग से शिक्षा देने की पद्धति का विकास किया। इसकी विस्तृत जानकारी “आईने अकबरी’ से मिलती है। जिसके अनुसार प्रत्येक बच्चे को वर्णमाला का ज्ञान कराना चाहिए और उसका अभ्यास करना चाहिए | इसके बाद उसे कविताओं और ईश्वर प्रार्थना के गीत कंठाग्र कराना चाहिए। ऐसा करने से बालक एक महीने में उतना सीख लेगा जितना वह एक वर्ष में पढ़ता है।
उच्च शिक्षा मदरसों में दी जाती थी। वह भी प्रायः मौखिक होती थी। अध्यापक व्याख्यान देते थे और विद्यार्थियों को किताबें पढ़ने के लिए प्रेरित किया जाता था |
विद्यार्थियों के सर्वांगीण विकास के लिए शिक्षक व्यक्तिगत ध्यान देता था। फिर भी बौद्ध शिक्षा प्रणाली की तरह “मानीटर” पद्धति प्रचलित थी। इस व्यवस्था के अंतर्गत शिक्षक की अनुमित से ऊँची कक्षा के विद्यार्थी निचली कक्षा के विद्यार्थियों को पढ़ाते थे परंतु अकबर इस व्यवस्था से संतुष्ट नहीं था, क्योंकि इससे बहुत समय नष्ट होता था।
इस दोष को दूर करने के लिए प्राचीन भारतीय पद्धति का अनुसरण किया। जिन मदरसों में धर्म, तर्कशास्त्र, दर्शनशास्त्र और राजनीति जैसे विषयों की शिक्षा दी जाती थी वहां विश्लेषणात्मक तरीकों को प्रयोग में लाया जाता था।
महत्वपूर्ण विषयों पर राजदरबारों के विद्वानों के बीच वाद-विवाद होता था।
फिरोज तुगलक और अकबर के दरबार इस प्रकार के वाद-विवाद के लिए प्रसिद्ध थे |
मध्यकाल में स्वाध्याय की पद्धति भी प्रचलित थी|
मध्यकाल में प्रचलित पाठ्यक्रम को ध्यान में रखते हुए मुल्ला निजामुद्दीन ने 18वीं शताब्दी में दर्स-ए-निजामी निश्चित किया तथा उनके अनुसार यह पाठ्यकम भारत में मुसलमानों के शासन के आरंभ से प्रचलित था। इस पाठ्यकम के अन्तर्गत ग्यारह विषय थे तथा प्रत्येक विषय के लिए अलग-अलग पुस्तकें थी।
अकबर का मकबरा
अकबर का मकबरा सिकंदरा नामक गांव में स्थित है, जिसे सुल्तान सिकंदर लोदी ने अपने नाम पर बसाया था। अकबर ने इसका नाम “बहिश्ताबाद” (स्वर्ग जैसा सुखमय स्थान) रखा था।
यह आगरा से पांच मील की दूरी पर दिल्ली जाने वाली सड़क पर स्थित है। इसके निर्माण की योजना अकबर ने बनवाई थी, किंतु निर्माण जहांगीर ने 1613 ई. में करवाया था।
इस मकबरे में पांच मंजिलें हैं। इसकी प्रत्येक ऊपर की मंजिल नीचे की मंजिलों से आकार में छोटी होती गई हैं। इस मकबरे की विशेषता, इसका गुंबद-विहीन होना है।
अकबर के काल में महाभारत का फारसी अनुवाद
अकबर ने अपने राजकवि फैजी की अध्यक्षता में एक अनुवाद विभाग की स्थापना की थी। अकबर के आदेश से महाभारत के विभिन्न भागों का “रज्मनामा’ नाम से फारसी में अनुवाद फैजी के ही निर्देशन में नकीब खां, बदायूंनी तथा फैजी आदि विभिन्न विद्वानों के सम्मिलित प्रयासों से किया गया। इसके अतिरिक्त बदायूंनी ने ‘रामायण’ का, फैजी ने ‘लीलावती’ का तथा अबुल फजल ने ‘कालियादमन’ का फारसी में अनुवाद किया।
'जरी कलम' की उपाधि
अकबर के दरबार के प्रसिद्ध ग्रंथ कर्ताओं (जिनकी एक सूची ‘आइने अकबरी’ में मिलती है) में सबसे प्रमुख कश्मीर का ‘मुहम्मद हुसैन ‘ था, जिसे अकबर ने ‘जरी कलम’ की उपाधि प्रदान की थी।
जरी-कलम़ का अर्थ है सुनहरी कलम। यह एक किताब थी जो अकबर बादशाह ने कैलीग्राफी़ के माहिर एक कलाकार मुहम्मद हुसैन अल कश्मीरी को दी गई थी।
हरिविजय सूरि
हरिविजय सूर वह जैन साधु था, जो अकबर के दरबार में कुछ वर्ष तक रहा एवं जिसे ‘जगद्गुरु‘ की उपाधि से सम्मानित किया गया।
1582 ई. में अकबर ने उक्त जैनाचार्य को जैन सिद्धांतों को समझने की इच्छा से आहूत किया था। इनकी विद्वता एवं चिंतन तथा विनम्रता से प्रभावित होकर अकबर ने कुछ दिनों के लिए मांस भक्षण बंद कर दिया था एवं पशु-पक्षियों के वध पर भी रोक लगा दी थी।
मुगल दरबार में एक अन्य विद्वान जिन चंद्र सूरी भी रहते थे जिन्हें ‘युग प्रधान’ की उपाधि प्रदान की गई थी।
हेमचन्द्र (1078 – 1162) राजा सिद्धराज जयसिंह के सभा-कवि थे।
मुगल सम्राट अकबर के समय का प्रसिद्ध चित्रकार
अकबर कालीन चित्रकारों के नाम अबुल फजल ने अपनी आइने अकबरी’ में गिनाएँ हैं-
दसवंत, बसावन, केशव लाल, मुकुंद, मिस्किन, जगन, महेश, खेमकरण, तारा, सांवल, हरिवंश।
दसवंत, जो एक कहार का बेटा था, के काम से अकबर इतना प्रभावित हुआ था कि उसने इसे ‘अपने समय का पहला अग्रणी कलाकार’ बनने में सहयोग दिया। किंतु बाद में यह महान चित्रकार मानसिक रूप से विक्षिप्त हो गया और 1584 ई. में इसने आत्महत्या कर ली।
इंग्लैंड की रानी एलिजाबेथ 1 का समकालीन भारतीय राजा अकबर था।
ध्यातव्य हो कि दिसंबर 1600 ई. में ईस्ट इंडिया कंपनी की स्थापना के समय इंग्लैंड की रानी एलिजाबेथ थी। भारत में उस समय अकबर (1556-1605) का शासन था।
एलिजाबेथ प्रथम का शासनकाल 1558-1603 ई. था तथा अकबर का शासनकाल 1556 – 1605 ई. तक।
रॉल्फ फिंच (1583-91) फतेहपुर सीकरी और आगरा पहुंचने वाला पहला अंग्रेज व्यापारी था। इसने भारत के विभिन्न भागों में भ्रमण करते हुए अनेक स्थानों का अवलोकन किया तथा 16वीं सदी के भारतीय व्यापारिक तथा नगर केंद्रों के बारे में मूल्यवान विवरण प्रस्तुत किया।
By- lbsnaa jeet
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